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बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

उन की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी

अक्स-ए-रुख़-ए-यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ में माह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार
ख़ू तेरी हूर-ए-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

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  1. Garib Vo Nahi jiske pas Dhan Kam hai
    balki Dhanwan Hote hue Jiski Ikcha Kam Nahi Hui hai Vo Sabse Aadhik Garib hai
    J

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  2. साधुवाद भाई. आप भी चुन चुन कर रचनाएं लातें हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ्बहुत अच्छा ……………॥उम्दा………

    उत्तर देंहटाएं

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