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प्रिय मित्रों ,हिन्दीकुंज में रणजीत कुमार जी  के स्तम्भ 'मंगलज्ञानानुभाव' के अंतर्गत आज प्रस्तुत है - विचारों की निर्जला . यह लेख विचारों की अनुभूति से सम्बंधित है . आशा है कि आप सभी को यह लेख पसंद आएगा. इस सम्बन्ध में आप सभी के सुझाओं की प्रतीक्षा रहेगी . 


विचारों की निर्जला 
अचानक मन घबराता है और प्रारंभ होता है विचारों का उथल पुथल हर घटना में मन ही है जो यातो सफलता का लेबल लगाता है या फिर असफलता का. पर वस्तुतः  ये मात्र एक घटना थी उससे जयादा कुछ नहीं कुछ अच्छा  हो तो मन कूद कर श्रेय लेना चाहता है और अगर कुछ अशुभ तो दूसरों पर टालना आदत होती है. मन के मायाजाल को ठीक से समझें तो ज्ञात होगा की विचारों की श्रृंखला पे कोई अंकुश नहीं ये जारी हैं हमेशा और कारण हैं हमारे अस्थिरता का. मन विचारों का पुलिंदा मात्र हमारे मानस पटल पर वो तरंग उत्पन्न करता है जो हमेशा हमे एक दौड़ की और धकेलते रहता है.
क्या आपने अनुभव किया है की आप जिस  चीज़ के लिए कामना करते है वो आपको मिल जाता है तो कैसी खुशी होती है. ये खुशी क्षणिक होती है हमे लगता है कुछ  विशेष जो हमने चाहा के मिलने के कारण ये एहसास था पर वस्तुतः ये आनंद अनुभव निरंतर मन में चल रहे विचार पे पूर्ण विराम का फल था. पर इक्षाएं अनंत हैं और एक के बाद दूसरे का आना स्वाभाविक भी और येही कारण है ये खुशी के क्षणिक होने का. मन को चाहिए कोई विचार अगर मन को न मिले कोई विचार तो क्या हो मन का नमन हो सकता है और नमन हुआ तो अंदर अमन हो सकता है और अमन में नए चमन की सम्भावना है. शायद ये मन ही हैं जिसे एक सुलझा हुआ सत्य भी मिल जाए तो उसे उलझा ले.
विचारों की निर्जला आनंद के अनुभूति  की  द्वार खोलती है आइये कुछ पल विचार न करने पर विचार करें मंथन करें की जब मन को लेबल लगाने का मौका नहीं मिलेगा तो क्या होगा , क्या होगा जब हर घटना स्वीकार होगी पूर्णतः बिना किसी आरोप प्रत्यारोप के. मन की कलाबाजी से स्वतंत्र होने की प्रक्रिया में आपका हमराही सत्यान्वेषी

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