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एक ऐतिहासिक लोककथा याद आ रही है। एलग्जेंडर ने भारत प्रवेश के दौरान यहां के लोगों को पेड़ के नीचे आराम से बैठे देखा तो उसे आश्चर्य हुआ था। कहते हैं कि उसके आदेश पर सैनिकों के द्वारा उन साधुओं को डरा-धमकाकर राजा के सम्मुख ले जाने की कोशिश की गई। मगर उन्होंने राजा के दरबार में जाने से साफ मना कर दिया। कहा जाता है कि उन्हें पैसे और सांसारिक सुख का लालच भी दिया गया। कहलवाया गया कि इससे उन्हें बेहतर खाने-पीने-रहने की सुविधा होगी। फकीर ने पूछा, फिर क्या होगा? राजा के प्रतिनिधि ने कहा था, इससे तुम्हें सुख चैन व आराम का जीवन मिलेगा। तो फकीर ने तुरंत जवाब दिया था कि वह तो मुझे अभी भी मिल रहा है, मैं पेड़ के नीचे आराम से बैठा हूं और आनंद में हूं, फिर उसी के लिए तुम्हारे राजा के पास जाने की क्या आवश्यकता?
आनंद सुख की अनुभूति का चमकोत्कर्ष है। यह अलौकिक है। यकीनन यह बाहर नहीं अंदर होता है। सुख-चैन व्यक्ति की मानसिक अवस्था है। उसकी अपनी सोच है। जीवन के प्रति दृष्टिकोण है। एक स्तर तक ही बाह्‌य वातावरण उसके लिए प्रभाव डाल सकते हैं। अंत में स्वयं को स्वयं के अंदर ही ढूंढ़ना पड़ता है। यह परम सत्य है। संतोष में सुख है और निरंतर सुख में आनंद। और आनंद स्थिरता लाता है। असीम शांति प्रदान करता है। अमूमन हम मस्ती को आनंद समझ कर भ्रमित होते हैं। उपरोक्त उदाहरण में किसी को आलस्य दिखाई दे सकता है। राजा व सिपाही क्रियाशील हैं और आज के बाजार के प्रतीक। बात अगर कर्म की आ जाए तो यूं तो पारंपरिक तपस्या की अवस्था में भी कोई शारीरिक कार्य नहीं हो रहा। मगर शरीर को तपाया जा रहा है, साधना के दौरान ध्यान केंद्रित है। क्या ये कर्म नहीं? बिल्कुल है। मन-मस्तिष्क को ध्यानमग्न करके साधनारत रहना भी एक तरह का कार्य है। इसमें भी ऊर्जा का व्यय होता है। उपरोक्त लोककथा में यह पूरी तरह स्वेच्छा से किया जा रहा था। तभी साधु आत्मविश्वास से जवाब दे पाये। किसी भी कार्य करने में, अगर वो पसंद का है तो पहले खुशी और फिर धीरे-धीरे आनंद की प्राप्ति होती है। अर्थात कार्य में सुख नहीं है, सुख हमारी पसंद नपसंद में है। क्योंकि वही काम किसी को अच्छा लगता है और सुख देता है तो किसी को बिल्कुल पसंद नहीं। नापसंद होने पर यही अरुचिकर व नीरस बन जाता है। तकलीफ देता है। व्यक्ति परेशान और अंत में दुखी हो सकता है। हताशा इसका चरम बिंदु है। राजा व सिपाही के लिए साधु का आचरण मूर्खतापूर्ण व अकर्मण्यता का प्रतीक था। जबकि वे तो अपने आनंद में डूबे हुए थे।
किसी से मैंने कहा, और शायद यह सच भी है, कहा भी जाता है कि लेखन, सरल शब्दों में कहें तो पठन और पाठन, अपने आप में तपस्या है। यह कइयों के लिए बेवकूफी भरा कार्य होगा। आज के वैभवपूर्ण युग में जहां पैसा, पॉवर और लोकप्रियता हर बात का बैरोमीटर है तो उसमें यह बात प्रथम दृष्टि ठीक भी लगती है। तभी मन में कभी-कभी ख्याल आता है कि अगर मैं पढ़ और लिख नहीं रहा होता तो क्या कर रहा होता? यह सवाल अमूमन पूछा भी जाता है। ऐसे बहुत से काम हैं जो मायावी दुनिया में सफल होने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। यकीनन उन्हीं में से कुछ कर रहा होता। हो सकता है निष्क्रिय रहता। और यूं ही जीवन गुजार देता। खा-पीकर और सोकर। या फिर शायद आधुनिक प्रतिस्पर्द्धा की मारधाड़ वाली दिनचर्या में ही पगलाया रहता। वैसे क्या सांसारिक वैभव प्राप्त करने वाले कार्यों में मेहनत नहीं है? बिल्कुल है। मुझे तो लगता है कि चुगलखोरी, गुंडागर्दी, नेटवर्किंग यहां तक कि घर-मोहल्ले की छोटी राजनीति में भी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। अच्छे और बुरे की बात तो बाद की है। आवश्यक प्राकृतिक कर्म को छोड़ हर दूसरा कार्य अपने आप में लगन और फोकस चाहता है। यह भी सत्य है कि हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना किसी तपस्या से कम नहीं। सिर्फ चित्रकार ही चित्रों में डूबा नहीं रहता, न ही सिर्फ समाजसेवी को सेवा का धुन सवार रहता है। छात्र को अव्वल आने के लिए जान लगा देनी पड़ती है। धनवान को पैसे बटोरने का पागलपन देखने लायक होता है और वह उसी जुगाड़ में लगा रहता है। दिन-रात मेहनत करता है, योजनाएं बनाता रहता है, शारीरिक और मानसिक ऊर्जा लगाता है। और पूरी तरह से अपनी मंजिल को पाने के लिए, एक उद्देश्य के साथ लक्ष्य पर केंद्रित रहता है। तो क्या यह तपस्या नहीं?
कोई भी कार्य पूरी तन्मयता के साथ और ध्यानपूर्वक निरंतर किया जाये, वो अपने आप में एक तपस्या है। और यही कर्म पहले खुशी फिर सुख देने लगता है जब कार्य आपकी पसंद का हो, मनमाफिक हो। आप उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं और सुख-दुख इसकी सफलता-असफलता पर निर्भर करने लगता है। ऊपर बताए गए धनवान को, हजारों-लाखों के नोट प्राप्त होने पर, जिस खुशी और सुख की प्राप्ति होती है उसकी व्याख्या यहां नहीं की जा सकती। मगर फिर सवाल उठता है, जब अच्छे और बुरे का ठप्पा लगने लगता है, तो दिमाग भ्रमित होने लगता है। कोई कह सकता है, दूसरे के मत को नकार सकता है, और यह सच भी है। यह अपना-अपना दृष्टिकोण भी हो सकता है। कोई विचारक कह सकता है कि जिस कार्य करने में स्वयं के हित के अतिरिक्त अन्य अर्थात समाज, राष्ट्र व मनुष्य जाति का अहित होता हो उसे तपस्या शब्द से अलंकृत करना उचित नहीं। सच है। मगर एक अर्थ में यह हमारी दृष्टि को सामाजिक व मानवीय पक्ष के द्वारा सीमित करता है। अन्यथा मेहनत तो मेहनत है। आदिकाल में भी तपस्या तो स्वकेंद्रित ही होती थी। अब इसे क्या कहेंगे? जैसे किसी को शारीरिक प्रेम में अत्यधिक सुख की प्राप्ति होती है और वो सदैव इसी में डूबा रहता है। वह सदैव शारीरिक संबंध बनाने के चक्कर में घूमता रहता है। उसके लिए यह किसी अच्छे और बुरे की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता। यहां भी सम्भोग से समाधि तक की बात की जाती है। यहां परेशानी तब होती है जब वह दूसरों पर जोर-जबरदस्ती करता है, परेशान करता है या फिर जब उसका शरीर साथ नहीं देता और मन भटकने लगता है। भटकी हुई आत्मा सुख नहीं देती। क्रोधित रहती है। बेचैनी लगती है। प्यासा आदमी संतुष्ट नहीं हो सकता है। और बिना संतोष के शांति नहीं मिल सकती। ऐसे में सम्भोग से समाधि छोड़ सामान्य जीवन भी नसीब नहीं होता। ठीक इसी तरह से बाकी सांसारिक कर्मों में भी एक स्तर के सुख के बाद, एक समय के पश्चात, विरक्ति आने लगती हैं। सांसारिक सुख न स्थायी है न निरंतर। और यही से शुरू होने लगता है भ्रमित होना, एक नये रास्ते की तालाश। असल में यह सुख आनंद की सीमा तक पहुंच ही नहीं पाता।
कर्म, जो बाहर की ओर न जाते हुए अंदर की ओर जाते हैं, वो कभी भी भ्रमित नहीं करते। उनकी राहें कभी धूमिल नहीं होती। उनका केंद्र, स्व के भीतर बैठा उस व्यक्ति विशेष की आत्मा है जहां पहुंचने पर फिर बाकी सब कुछ महत्वहीन और अस्तित्वहीन हो जाता है। दुःख और सुख भी। सृजन में ऐसा ही कुछ है। रचना प्रक्रिया पहले अंदर से बाहर और बाहर से अंदर होती रहती हैं। लेखन से विचार की उत्पति होती है और विचार से लेखन समृद्ध होता है। इनके माध्यम से सृजनकर्ता अपनी भावनाओं को काबू करके पहले तो बाहरी दुनिया के बारे में सोचता है। लेकिन फिर वह सोचते-सोचते बाहर से भीतर की ओर जाने लगता है। ध्यानमग्न। सदैव केंद्रित। आम जीवन से कटा हुआ। शब्दों से खेलता हुआ। अपनी दुनिया में मग्न। यह तपस्या ही तो है। इस तपस्या में तथाकथित सांसारिक मस्ती का तो सवाल ही नहीं, बहुत हद तक शारीरिक सुख भी नहीं, मगर आनंद है। परमआनंद। इसमें कोई वैभव नहीं नैसर्गिक सौंदर्य है। कोई भौतिक स्वीकृति नहीं है। एक शराबी को शराब से जितना नशा मिल सकता है उससे अधिक नशा है। यहां आंखें बंद करके आदमी कई बार विचारों में इधर-उधर भ्रमण तो कर सकता है मगर सृजन की सीमाओं में वह पूरी तरह से आत्मकेंद्रित है। एक सीमा के बाद वह दूसरों के लिए नहीं लिखता, वह स्वयं के साथ जुड़ जाता है। यह स्वयं, उसका 'मैं' नहीं, वो चरित्र बन जाता है जिसके लिए वो उस पल जी रहा है। अपने से परे यहां 'मैं' परिवर्तनशील हूं, इसलिए निःस्वार्थ हूं। वह स्वार्थ के लिए सोच ही नहीं सकता। धीरे-धीरे शब्द नहीं, भावार्थ महत्वपूर्ण होते चले जाते हैं। इतने कि फिर इसकी कोई भी कीमत नहीं लगाई जा सकती। और वह गहराई में डूबता जाता है। अर्थ गहरे बनते चले जाते हैं और संदर्भ विशाल। आदमी बाहर से अंदर और फिर अंदर से पूरे विश्व से जुड़ने लगता है। आत्मा से परमात्मा की ओर। यह एक तरह की तपस्या ही तो है। मगर फिर इस प्रक्रिया में भी जैसे ही लोकप्रियता, पद-पैसा और पॉवर जुड़ने लगता है तो यही तपस्या फिर प्रतिस्पर्द्धा में परिवर्तित हो जाती है और लेखक तपस्वी न होकर बेस्ट सेलर कहलाने के मोह में फंसता जाता है। तुलसीदास ने किसी महत्वाकांक्षा व लोभ में आकर रामायण की रचना नहीं की थी, न ही महान व लोकप्रिय लेखक कहलाने की इच्छा रही होगी और न ही ध्येय रहा होगा, शायद तभी उनकी रचना-प्रक्रिया तपस्या का उदाहरण है जहां उन्हें भगवान राम के दर्शन हुए।
मैं सृजन के दौरान, इस तपस्या से मिलने वाले परम आनंद की कुछ-कुछ अनुभूति ले रहा हूं। अगर आपको भी इस अमर रस का स्वाद चखना है तो ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, सिर्फ सृष्टि की किसी भी रचना में डूब जाइये। यह आपकी बनाई रचना भी हो सकती है। मगर ध्येय और ध्यान निःस्वार्थ हो और उसमें भौतिकता न हो। चूंकि ऐसे में वो रचना नहीं उपभोग बन जाती है और आप रचनाकार नहीं उपभोक्ता हो जाते हैं। बहरहाल, इसी विश्वास के माध्यम से आप अपने ईष्ट तक पहुंचते हैं। ध्यानमग्न हो जाते हैं। ये अलौकिक रचनाएं आपको कुछ और सोचने के लिए मौका ही नहीं देती। आपको असीम शांति के सागर में ले जाती हैं। यहां तर्क नहीं चलते, संपूर्ण समर्पण होता है और आपकी आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।

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