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राग रामकली
कबहुं बोलत तात
खीझत जात माखन खात।
अरुन लोचन भौंह टेढ़ी बार बार जंभात॥
कबहुं रुनझुन चलत घुटुरुनि धूरि धूसर गात।
कबहुं झुकि कै अलक खैंच नैन जल भरि जात॥
कबहुं तोतर बोल बोलत कबहुं बोलत तात।
सूर हरि की निरखि सोभा निमिस तजत न मात॥

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  1. सूरदास जी ने श्री कृष्ण का बाललीला वर्णन बहुत ही सुन्दर किया है..हमे सूरदास का ये बाल मुकुंद का वर्णन बहुत पसंद है..प्रभु को एक सामान्य बालक की तरह प्रसन्न होते देखना और किलकारियाँ करना.. मीठी तोतली बोली बोलना.. बिलकुल बाल सहज प्रवृतियाँ करना... आदि का अति मनोरम्य..मन लुभावना..मनोहर द्रश्य दिया है सूरदास जी ने...

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