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उसका सारा सामान मुश्किल से एक ठेले भर था। शायद वो सामान उस छोटे से कमरे में भरने के पश्चात् भी उस कमरे में एक बड़े सन्दूक की जगह बची रह जाये। पर आश्चर्य यह था कि उस अनजान मोहल्ले में उस घुटन भरी कोठरी में रहना उसने कैसे और क्यों स्वीकारा जिसमें न तो कोई बिजली की सुविधा थी और न ही पानी की। अब से पहले भी न जाने कितने लोग उस कमरे को बाहर से ही देखकर छोड़ गये। वह अन्धेरा व गुमनाम सा कमरा प्रतीक मात्र था। 
वह पतली, छोटे से कद की साँवली परन्तु सुन्दर नाक-नक्श वाली 22-23 साल की लड़की थी। जिसके साथ गैस का छोटा सिलंेन्डर, गिनकर आठ बर्तन, एक चटाई, झाडू, एक सूटकेस जिसमें शायद उसके कपड़े हों और हाथों में कपडों मेें लिपटी एक अजीब सी चीज थी। वह लड़की उस चीज को अपने सीने से इस तरह चिपकाये हुए थी कि मानो अपने सारे सामान में वह उसे सर्वाधिक प्रिय हो। एक हाथ से उस चीज को संभाले और दूसरे हाथ से अपना वह थोड़ा सा सामान उठाकर उस छोटी सी कोठरी में ले जा रही थी। सामान रखने में ठेले वाले ने भी उसकी मदद की। आस-पास वाले सभी उत्सुकता भरी नजरों से जड़ हुए वो सब देख रहे थे। चारों तरफ छाये उस सन्नाटे में मात्र यही प्रश्न गूँज रहे थे- यह कौन है? कहाँ से आई है? अकेली है? कैसे रहेगी यहाँ? क्या करती है? इस कमरे का मालिक जो इस कमरे से कहीं दूर किसी अन्य स्थान पर रहता था, कैसे एक लड़की को उसने कमरा दे दिया? कहीं यह उसी की परिचित तो नहीं?
तभी एक आवाज उस सन्नाटे को चीरती हुई हम सभी के कानों में पहुँची। इस आवाज को सुनकर सभी हतप्रभ रह गये। यह आवाज बच्चे के रोने की थी, जो उस अजीब सी कपड़ों में लिपटी चीज से आ रही थी, जो वह लड़की अपने एक हाथ में संभाले हुए थी।
बच्चा................. बच्चा.................., बच्चा भी है इसके साथ? इसका है? ये तो कुवाँरी लगती है! इसकी शादी हो गई क्या? इसका पति भी है? कहाँ है वह? ना जाने एक ही क्षण में कितने सवाल चारों और गूँजने लगे। मूक दर्शक की भाँति खड़े लोगों में अब चेतना आ गई और उत्सुकता भरी चर्चा चारों ओर होने लगी।
परन्तु वो लड़की चुपचाप उस बच्चे को दुलारती हुई अपने कमरे में चली गई। मौहल्ले में प्रवेश करने से लेकर कमरे में प्रवेश तक वह अपने चेहरे की गम्भीरता के पीछे बहुत से प्रश्न उस कमरे के बंद दरवाजों के बाहर छोड़ गई।
वो दरवाजा शाम तक बंद रहा और लोगों की चौपाल उस दरवाजे के बाहर चटपटी चर्चाओं के साथ सजी रही। मोहल्ले के एक भी आदमी या औरत ने उस मोहल्ले के नये सदस्य के दरवाजे पर कोई भी दस्तक न दी। किसी ने भी किसी भी प्रकार की सहायता की कोई पेशकश नहीं की। और करते भी तो क्यों? एक कम उम्र की अकेली लड़की बच्चे के साथ वो भी बिना पति के, मतलब साफ था-‘‘एक बिन ब्याही माँ’’।
दिन भर भिन्न-भिन्न लांछन लगते रहे। नई-नई कहानियाँ बनती रही। सामाजिक मान-मर्यादाओं पर भाषण चलते रहे और अन्ततः उसे चरित्रहीन घोषित करते हुए उसके सामाजिक बहिष्कार की सर्व सम्मति बन जाने से उससे कोई मतलब न रखने का निर्णय लिया गया।
शाम को 5 बजे अचानक दरवाजा खुला और वो लड़की चुपचाप बच्चे को संभाले मोहल्ले से बाहर चली गई। मोहल्ले के सभी लोगों ने वही पुराना काम पूर्ण दक्षता के साथ किया। उसे घूरते रहे, चर्चाएँ चलती रही और उसके लौटने का इंतजार बेसब्री के साथ नज़रे गड़ाये जारी रहा।
लगभग एक घण्टे बाद वह कुछ खाने का सामान और दूध लेकर लौटी। शायद दूध उस नन्हे बच्चे के लिए था। लोग पुनः उसका दरवाजा बंद होने तक उसे घूरते रहे। और वो अपने बच्चे में लीन अपनी कोठरी में चली गई।
अगली सुबह वह पता नहीं कब चली गई। सुबह-सुबह उसके कमरे पर ताला लगा था। मैंने बाहर झाँककर देखा तो इक्का-दुक्का लोग नज़र आये। सबकी नज़र बचाती हुई मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ी और उसकी टूटी खिडकी से उसके कमरे में झाँकने की कोशिश की। उस कमरे को देखकर उसके बदले हुए रूप की कल्पना भी न कर सकी। कमरे के अन्दर व बाहर आस-पास सफाई थी। हालाँकि बदबू-उमस थी परन्तु उतनी नहीं रही थी। और उस सफाई को देखकर यकीन है मुझे धीरे-धीरे वो सब भी समाप्त हो जायेगी। कमरे का सारा सामान व्यवस्थित था। उसके कमरे को देखकर मैं वापस आकर अपने घर की सफाई में लग गई। और साथ-साथ सोच रही थी कि उसने वो उमस भरी रात बिना बिजली के उस बच्चे के साथ उस बंद कमरे में कैसे गुजारी होगी? रात को न तो बच्चे के रोने की आवाज आई और न ही पंखे की कोई व्यवस्था ही कमरे में नज़र आई। मैं अपने घर की हर एक सुविधा की तुलना उसके कमरे की असुविधा से कर रही थी। मैं कभी पंखा बंद करती तो कभी लाइट तो कभी पानी और खुद को उस स्थिति में रखने की कोशिश करती। पर वाकई बहुत मुश्किल था। बहुत मुश्किल..............................
दोपहर को वो उसी गम्भीर मुद्रा में उस बच्चे के साथ कहीं से लौट आई और पहले की ही भाँति उस कमरे में बंद। शाम को पहले दिन की ही तरह वो फिर खाने पीने का सामान लेने बाहर गई और फिर वैसे ही दूध और कुछ खाने को लेकर लौट आई।
एक महीने तक हम सभी उसका यह रूटीन देखते रहे। उसके घर से सिर्फ उस बच्चे को खिलाने-दुलारने की आवाजें आती। उन आवाजों को सुनकर लगता कि वह और उसका बच्चा एक-दूसरे के साथ बहुत खुश थे और उनकी उस छोटी सी दुनिया में किसी और की कोई जगह नहीं थी। उस एक महीने मंे कोई भी उसके पास नहीं आया। मैं आश्चर्यचकित थी कैसे कोई उसकी सुध लेने नहीं आया? अकेली लड़की को ऐसे कैसे उसके परिवार ने छोड़ दिया? खैर! इन प्रश्नों के जवाब तो बस उन बंद होठों में ही छिपे थे और इन्हें खुलवाने के लिए कोई उस तक पहुँचा ही नहीं।  
एक दिन सुबह-सुबह मेरे दरवाजे की घण्टी बजने से मेरी नींद खुल गई। दरवाजा खोला तो सामने वो खड़ी थी। उसे देखकर मेरी आँखों से नींद ऐसे गायब हो गई जैसे मैं कभी सोई ही नहीं हूँ। मैं स्तब्ध खड़ी उसे देखती रही। मेरी आवाक् मुद्रा तब खण्डित हुई जब उसने कहा- गुड मार्निंग दीदी। दीदी मैं आपकी नई पड़ौसी हूँ। माफ कीजिएगा मैंने आपको इतनी सुबह-सुबह जगा दिया। परन्तु ये मेरी मजबूरी थी। गर्मी के कारण रात मेरा दूध फट गया। और मेरी बच्ची भूखी है। इसे दूध चाहिए। इतनी सुबह-सुबह मार्केट भी बंद है। क्या मुझे बच्ची के लिए एक कटोरी दूध मिल जाएगा। मैैं शाम को ही इसे वापस कर दूँगी। 
उसके शालीनता भरे शब्द सुनकर मैं उसे ना तो कह ही नहीं सकती थी। परन्तु जब मैंने उस बच्ची को उसकी गोद में रोते देखा तो मैं तुरन्त दूध की खाली बोतल जिसे बच्ची के मुँह से लगाकर वह उसे बहकाने की कोशिश कर रही थी, उसके हाथ से छीनकर उस मासूम के लिए दूध तैयार करने चली गई।
वापस लौटी तो वो बच्ची को चुप कराने की असफल कोशिश कर रही थी। दूध की बोतल देते हुए उसके धन्यवाद से पहले मेरे जिज्ञाषा भरे शब्द उस तक पहुँच गये- ‘‘तुम कौन हो?’’
वो जैसे इस प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार थी। उसके उस गम्भीर चेहरे पर पहली बार मैंने वो मुस्कुराहट देखी। मैंने बाहर झाँकते हुए उसे अन्दर बैठने के लिए कहा और पुनः अपना प्रश्न दूसरे रूप में दोहराया। कुछ अपने बारे में बताओ।
वो बोली- दीदी मेरा नाम शिवानी है। मैं एक स्कूल शिक्षिका हूँ। यहाँ अपनी दो महीने की बच्ची के साथ रहने आयी हूँ। ये कहकर वो चुुप हो गई।
उसके सुबह जाकर दोपहर को आने की बात तो समझ में आ रही थी। परन्तु मुझे असली उत्सुकता उसकी बच्ची को लेकर थी जो दूध पीती हुई इतनी प्यारी लग रही थी कि मेरा मन कर रहा था कि उसे शिवानी से छीन लूँ। परन्तु मन में स्थित उन्हीं बातों ने मुझे रोक लिया जिनकी वजह से मोहल्ले वालों ने शिवानी का बहिष्कार किया था। पता नहीं किसका पाप है? मैं जल्द से जल्द उसे अपने घर से भगाना भी चाहती थी लेकिन उसके बारे में और अधिक जानना भी चाहती थी। दुविधा भरी स्थिति से जूझते हुए मैंने उसके विषय में जानने का निर्णय लिया और तिरस्कृत वाणी में पूछा- ‘तुम्हारी उम्र तो 22-23 के आस-पास लगती है और इतनी कम उम्र में तुम दो महीने की बच्ची के साथ अकेली यहाँ रहती हो। ऐसा क्यों?
मेरी बात सुनकर वो हँसने लगी। और फिर धीरे से बोली- हमारे समाज की सोच का दायरा कितना सीमित है ना दीदी? जहाँ एक लड़की और बच्चा बिना किसी पुरूष के देखा वो सोच बस एक ही दिशा में सीमित हो जाती है। दीदी यह एक कुण्ठित समाज है जो मर्यादाओं, नियमों, कायदों, कानूनों का झूठा आवरण ओढ़े है। वो आवरण जो मात्र औरत की ओढ़नी है।
यह बोलकर वो एक मिनट के लिए चुप हो गई और मैं उसके तिलमिलाते चेहरे को घबराई नज़रों से देखती रही। पर एक मिनट के बाद वो शान्त हुई और बोली-दीदी यह बच्ची मेरी अपनी बच्ची नहीं है। हमारे गाँव की रिश्तेदारी में एक दुर्घटना में इस बच्ची के परिवारजनों की मृत्यु हो गई थी। कोई अन्य सहारा न होने के कारण मेरा परिवार इसे अपने घर ले आया। मैं हमेशा से चाहती थी कि मैं एक ‘बच्ची’ गोद लूँं। जिसकी सारी जिम्मेदारी मैं उठाऊँ। जिसे मैं एक परिवार दूँ, माँ-बाप का प्यार दूँ। जिसका भला मैं कर सकूँ। न जाने कितने बच्चे विभिन्न प्रकार की दुर्घटना में अनाथ हो जाते है। उनमें से कुछ का बचपन सड़कों पर और कुछ का अनाथालयों में बीतता है। यदि आप अनाथालय में जायें तो वहाँ इस बच्ची जैसे और भी न जाने कितने बच्चे अनाथालय के बाहर की दुनिया से आने वाले हर व्यक्ति को तरसायी आँखों से देखते हैे कि मानो कह रहे हों कि ‘‘हमें यहाँ से अपने साथ ले जाओ। हमें भी एक परिवार दे दो। एक नया संसार, जहाँ हमारे माँ-पिता, भाई-बहन हो। जहाँ हमें खुली हवा मिले सांस लेने के लिए। प्यार मिले जीने के लिए।’’ मैं इस बच्ची को अनाथ होने के अहसास से दूर करना चाहती थी। इसीलिए मैंने इस बच्ची की माँ बनने का निर्णय अपने घरवालों को सुनाया।  
परन्तु मेरे घरवालों ने मेरे इस फैसले का घोर विरोध किया। उनके अनुसार इसके साथ मुझे समाज स्वीकार नहीं करेगा। मेरी कहीं शादी नहीं होगी। लड़का होता हो तो शायद लोगों को स्वीकार्य भी होता परन्तु लड़की के साथ कौन मुझे अपनायेगा। मुझ पर विभिन्न प्रकार के लांछन लगाये जायेगें। इसलिए मुझे यह ख्याल छोड़ देना चाहिए। 
लेकिन मैं अपने फैसले पर दृढ़ रही। लड़के को तो कोई भी गोद लेने के लिए तैयार हो जाता है परन्तु क्या इन बच्चियों को माँ-बाप के प्यार नहीं चाहिये होता? क्या इन्हें अच्छी शिक्षा लेने का हक नहीं है? मैं इस बच्ची को वो सब देना चाहती थी जो एक सामान्य परिवार में दिया जाता है। मैं इसे इसका सम्मान दिलवाना चाहती हूँं।    
मेरा यह संकल्प मेरे परिवार को रास नहीं आया और उन्होंने मुझे अपने परिवार का हिस्सा न रहने दिया। इसी कारण मैं ‘अकेली माँ’ अपनी बच्ची के साथ अपने इस छोटे से घर में रहती हूँ। पता नहीं क्यों लोग ये क्यों नहीं सोचते कि यदि हर परिवार एक बच्चे को मेरी तरह गोद ले ले तो कोई भी अनाथ बच्चा चोर, डाकू नहीं बल्कि एक आदर्श नागरिक बन जायेगा। 
अच्छा दीदी अब मेरे स्कूल का समय हो रहा है। मैं चलती हूँ। कहकर वो चली गई। और मैं सन्न खड़ी उसके चंद शब्दों की विशाल गहराई में डूबी रह गई................................




यह कहानी नीरज तोमर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य से जुडी हुई है.   

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  1. Your poetry is so simple and yet so captivating. You have expressed the state of our society vividly and have given us a very good message and inspired us to adopt the orphan children, through which we can not only fulfill their dreams and provide them the love and care they deserve, but can also help in reducing crime as well as in controlling population.

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  2. Your poetry is so simple and yet so captivating. You have expressed the state of our society vividly and have given us a very good message and inspired us to adopt the orphan children, through which we can not only fulfil their dreams and provide them the love and care they deserve, but can also help in reducing crime as well as in controlling population.

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  3. Your story is so simple and yet so captivating. You have expressed the state of our society vividly and have given us a very good message and inspired us to adopt the orphan children, through which we can not only fulfil their dreams and provide them the love and care they deserve, but can also help in reducing crime as well as in controlling population.

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  4. aapki is kahani ne logon ki mansik soch ke darshan kara diye...bahut umda prayaas...

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  5. kahani acchi hai ............yadi yuva varg ke vichaar mein parivartan aaye to samaj ki maansikta mein parivartan asambhav nahin hai. shayad yeh sandesh sab tak pahunche is sambhavnaon ke saath aap ka abhinandan.

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  6. very nice story ... agar har 5 me se 1 bhi ye atmasat kar paye or use apne vastavik jeevan me utar le to anathalay or apradh kafi had tak kam ho jayen .... jago bharat jago

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  7. bahut bhaavpurn kahani hai, bahut-bahut badhai, chhoti maansikata par badi prabhavi chot ki hai, Meri Shubhkamnayein

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  8. Horrible story! Even writers as great as Chekhov and Tolstoy were very modest about their initial writings, but you should try to out some fun it the stories, without compromising upon the social agenda the least.-Sonalika

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  9. "आरम्भ से ही दिमाग इस कहानी के इसी अंत की ओर संकेत करता रहा.... और अंत में एक संतुष्टी का एहसास हुआ..."
    मानसिक संकीर्णताओं पर एक सकारात्मक प्रहार है यह कहानी... आभार.

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  10. sbhi pratikriyao k liye bhaut bhaut shukriya.
    aapke sujhav n sndesh nishchit roop se mere liye ataynt moolyevaan h.
    mai sada inke liye apekshit hu.
    ek baar fir aap sbhi ka dhanyewaad

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  11. This is a simple story containing a huge amount of real and helpful thoughts and heart you have. I bent down to salute you.


    Kailash Singh,
    CDRI, Lucknow

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  12. bin byahi ma padhkar achha laga samaj ko aise badlav ki jarurat hai

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  13. समाज को आइना दिखती
    अद्भुत रचना
    समाज की वास्तविकता उजाकर करती
    need to change society

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