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बाग में बैठी हुई लड़की
के इर्द-गिर्द
की पूरी दुनिया गुम है उसके लिए
बस लड़की है
और वो बैठी है...

लड़की चुप है या कुछ बोल रही है
कोई नहीं सुन रहा है...
वो किसी और के सुनने के लिए नहीं,
खुद के लिए बोलती है
वो धीरे-धीरे गुनगुना भी रही है...
वह संगीत भी सिर्फ़ पेड़ों की शाखों को झुलाने के लिए है...
वो फूलदार झाड़ियों, साफ़ नीले आकाश,
हरी घास से होते हुए सपनों में झांक रही है
अपने-आप में गहरे उतरी हुई है,
इसलिए अभी बाहर वालों से महफूज़ है...

लोहे की एक बैंच पर बैठी
जाने क्या सोचकर-गुनकर
रह-रह कर
जोर से
सिर्फ़ अपने लिए खिलखिलाती हुई
लड़की
और कोने में फूलों के झाड़ पर बैठी
पर फडफडाती
सुनहरी तितली में
एक बारीक़ साझेदारी तो है,
खुल कर पंख फ़ैलाने की आजादी में...
एक शर्त लगी है, कि
कौन ज्यादा मचल कर
उड़ सकता है !

बाग में बैठी लड़की
उड़ रही है...

और इसे या तो वह जानती है या
शायद वह तितली !

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