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[1]

मैंने नहीं चाहा

दृष्टि-पथ पर दूर तक

रंगीन सपनों के चरण न घूमें!

.

मैंने नहीं चाहा

जीवन के गगन में

सावनी के स्वर न गूँजें!

रस-वर्षिणी घन बदलियाँ न झूमें!

.

मैंने नहीं चाहा

मधु कल्पनाओं के

विफलता की थकन से

पंख जाएँ टूट,

यौवन

उमड़ती ज्वार की लहरें न चूमे !

.

पर, सब अनचहा होता गया —

स्वप्न सारे हो गये विकलांग,

सावन की सरसता खो गयी,

अनुरक्त अन्तस की मधुरता

जब विषैली हो गयी !

[2]

हमने नहीं चाहा —

कि इस घर के

सुनहरे-रुपहले नीले गगन पर

घन आग बरसे !

*

हमने नहीं चाहा —

कि इस घर का

अबोध-अजान बचपन

और अल्हड़ सरल यौवन

प्यार को तरसे !

*

हमने नहीं चाहा —

कि इस घर की

मधुर स्वर-लहरियाँ खामोश हो जाएँ,

यहाँ की भूमि पर

कोई घृणा प्रतिशोध हिंसा के

विषैले बीज बो जाए !

*

हमने नहीं चाहा —

प्रलय के मेघ छाएँ

और सब-कुछ दें बहा,

गरजती आँधियाँ आएँ

चमकते इंद्रधनुषी

स्वप्न-महलों को हिला कर

एक पल में दें ढहा !

*

पर, अनचाहा सब

सामने घटता गया,

हम देखते केवल रहे,

सब सामने

क्रमशः उजड़ता टूटता हटता गया ! अनचहा

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