6
Advertisement

धीरे धीरे पुल की ओर बढ़ते गौरी के कदम उसके मानस पटल पर पुरानी स्मृतियों को सामने ला रहे थे ।आकाश में बादल बस बरसने ही वाले थे और लगता मानो ये मेघ इस प्यासी धरती पर न्यौछावर होने को आतुर हैं पर..... गौरी वो तो बस चलती ही जा रही थी ।आज उसने पक्का निश्चय कर लिया था कि रोज की इस घुटन भरी जिन्दगी से मुक्ति पा लेगी खत्म कर देगी ये जिन्दगी से जद्दोजहद और बस सब शांत हो जायेगा हमेशा के लिये।

कुछ रोज हुए उसकी इकलौती सहारा उसकी माँ भी उसे तन्हा छोड़ कर दूसरी दुनिया में चली गई थी ,अब गौरी के जीवन में सिवा तन्हाई के कुछ भी न था पहाड़ सी लम्बी जिन्दगी वो किसके सहारे जीती ।वो एक छोटी सी फैक्टरी में काम करती थी कालेज के बाद अच्छे अंक होने के बावजूद पैसे के अभाव से वो आगे नहीं पढ़ सकी ।माँ बेचारी अपने बूढ़े तन से आजीविका का भार कब तक ढोती ।कई जगह धक्के खाने के बाद ये नौकरी उसे मिली थी तो अब माँ उसका साथ छोड़ गई थी ।जब तक माँ थी तो जो हाथ उसे आशीष के लिये उठते थे आज उन्ही लोगों की नजरों में हवस नजर आने लगी थी । समय सब कुछ बदल देता है करीबी से करीबी रिश्ता भी खोखला नजर आने लगता है । नीरज उसका सच्चा साथी भी अब उससे मुंह मोड़ने लगा था उसकी ऊंचे रुतबे की चाहत ने उसे गौरी से दूर कर दिया था ।

गौरी बहुत हौसले वाली थी परंतु जीवन में एक के बाद एक लगी ठोकर से वह टूट चुकी थी ।वो सब कुछ खत्म कर देना चाहती थी अपना अस्तित्व अपना वजूद ।अब तक वो पुल के पास पहुंच गई थी ।बारिश की नन्ही नन्ही बूंदे पड़नी शूरु हो गई थी खराब मौसम की वजह से सड़क पर आवाजाही भी कम थी ।ये पुल घर से नजदीक ही था अकसर वो अपने घर की खिड़की से पुल के नीचे से गुजरती इस शांत नदी को देखा करती थी मगर आज गौरी के मन की तरह ये भी अशांत थी।गौरी पुल के बीच में रूक कर कुछ क्षण नदी को देखती रही उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए बस दो गीले मोती उस उसकी आँखों से निकल कर कहीं जज़्ब हो गए । उसके कदम उपर उठे तभी उसे एक स्वर सुनाई दिया , "दीदी ! कहां जा रही हो मुझे भी साथ ले चलो ना. ...... आज मुझसे मिलने भी नहीं आई ......नाराज हो क्या ? तुम यहां क्यों खड़ी हो........ मुझे पता है तुम्हें बारिश बहुत पसन्द है पर तुम तो हमेशा मुझे भी साथ लाती हो भीगने के लिये ........"नन्हा मन न जाने कितने सवाल कर बैठा ।गौरी जो एक क्षण पहले अपनी जिन्दगी खत्म करने वाली थी आत्मग्लानी से भर गई कि वो अपनी परेशानी में नीशु को कैसे भूल गई .........नीशु एक अनाथ लड़की थी जो उसके पड़ोस में अपने चाचा के पास रहती थी जो अकसर नशे में चूर रहता था ।नीशु का ज्यादा समय गौरी के साथ बीतता था ।गौरी ने आगे बढ़कर नीशु को अपने सीने से लगाकर कहा,"मैं अब तुम्हें कभी अकेला छोड़ कर नहीं जाऊँगी ..........मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी.................तुम्हें दूसरी गौरी नहीं बनने दूंगी।"नई चेतना के साथ बारिश की रिमझिम में गौरी के कदम नीशु को साथ लिये घर की ओर बढ़ने लगते हैं……………………..

एक टिप्पणी भेजें

  1. सुन्दर संदेश देती है कहानी।केवल खुद के लिये नही औरों के लिये जीना भी जीने को मकसद दे जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वन्दना जी और अरुणेश जी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत मर्मस्पर्शीय ... जीवक का संदेश छिपा है इस कहानी में ....

    उत्तर देंहटाएं
  4. Dear Suman!your writing is mature "समय सब कुछ बदल देता है",your views are realistic.My best wishes for you. SHOBHA GUPTA

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top