6
Advertisement
हूक सी दिल में उठाते क्यूँ हो।
दर्द-ऐ-दिल मेरा बढ़ाते क्यूँ हो॥ 

जिसकी कोई वज़ह कभी हो ही नहीं सकती है।
ऐसी उम्मीद भला मुझमें जागते क्यूँ हो॥

रहनुमा बन के जो सिर्फ गुनाह करते हैं।
उनकी खातिर हमें शूली पर चढ़ाते क्यूँ हो॥

हम तो इन्सान हैं इंसानियत के कायल हैं।
मज़हबी आग में हमको जलाते क्यूँ हो॥

जिन्हें दो जून की रोटी नहीं नसीब होती।
छीनकर मरने का हक़ उनको सताते क्यूँ हो॥ 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top