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मेरे हाथों में गर हुनर होता।
मेरी चाहतों का शहर होता॥

होता अगर जो खुदा कहीं।
तो दुआओं का भी असर होता॥

कोई ग़म करीब यूँ आ गया।
मैं देखती हूँ जिधर, होता॥

अभी दूर है मंज़िल मगर।
हसीं साथ हो तो सफ़र होता॥

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  1. होता अगर जो खुदा कहीं।
    तो दुआओं का भी असर होता

    वाह..वा...बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही है...

    नीरज

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  2. wastav men

    होता अगर जो खुदा कहीं।
    तो दुआओं का भी असर होता॥
    bakee bhee sab haqeeqat ke behad qareeb likha hai aapne
    itanee achchhee panktiyon ke liye kripaya badhai sweekar karen
    sadar
    ratnakar tripathi

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  3. खुबसूरत शेर दिल की गहराई से लिखा गया बधाई

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  4. शब्दों के अच्छे तालमेल से लिखी गई रचना सुन्दर........

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  5. आपने खुदा और दुआयों की बात को एक नया नजरिया दिया है. इस बढ़िया रचना के लिए बधाई हो....!

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  6. होता अगर जो खुदा कहीं।
    तो दुआओं का भी असर होता॥
    खुदा कहें या परमेश्वर, गॉड कहें या गुरु ग्रंथ साहिब किसी पंथ को न बदनाम करो, होगा यही वाजिब। अच्छी रचना है। बधाई।

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