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रोटी की तस्वीरों को

मैंने रंग भरा है

ये दीखते असली जैसे हैं

इसलिए भीखारी खड़ा है

मैं हूँ अलबेला कलाकार ऐसा

कहते हैं प्रसंशक

मेरे कला केंद्र पर

अक्सर भीखारी देते दस्तक

उस दीवार पे टंगी रोटी की

कीमत है अनमोल

भूखी आँखे भीखमंगो की

देखते हैं मुह खोल

मैं इस रोटी की तस्वीरों से

रोटी जीवंत बनाऊंगा

आशा है भूखे लोगों तक

वो रोटी पहुंचाऊंगा

और जो पहल है संभव

इश्वर के कैनवास पर

उसकी इच्छा मेरी अभिव्यक्ति

बैठा जो कैलाश पर ..............

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