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बौद्धिक दिवालियापन

और गिरवी चैतन्य

के बाद जो बचता है

वही मेरी परिभाषा है

बस एक बार फिर से

अंतर्मन की आवाज़

जो चकाचौंध ने दबा दी थी

सुनने की अभिलाषा है

मैं अपने लाश को खुद

देना चाहता हूँ मुखाग्नि

और ये भी चाहता हूँ की

मेरी अस्थियां किसी नाले में

कर देना प्रबाहित

निश्चय ही मोक्ष की प्राप्ति होगी

क्यूंकि हो चुकी है मैली गंगा

और हूँ मैं भी अपराधी

शायद नाले में ही ले लूँ मैं मौन समाधी .............

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