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आदमी की खाल में भेड़िया। इसी तरह की कहावतें व मुहावरें कहने-सुनने को आम मिल जाएंगी। व्यक्ति के चेहरे मात्र से उसके गुण-अवगुण का पता नहीं चलता। चरित्र कर्म द्वारा सुनिश्चित किए जा सकते हैं और परिस्थितियां उसे प्रमाणित करती हैं। यूं तो व्यक्तित्व का कोई आधार नहीं होता मगर पारंपरिक रूप में इसे संस्कारों से जोड़ दिया जाता है। किसी को पहचानना इतना आसान नहीं लेकिन हम आदतन अच्छे और बुरे की सामान्य वर्गीकरण से प्रभावित होते हैं। राक्षस और देवताओं के परस्पर युद्ध की कहानियों से पौराणिक कथाएं भरी पड़ी हैं। आधुनिक युग के नायक-खलनायक में इनका प्रतिबिंब देखा जा सकता है। धर्मग्रंथों में भी विभिन्न चरित्र अपने-अपने रूप-रंग में उपस्थित रहे हैं। राम और कृष्ण ने पृथ्वी पर जन्म लेकर देवताओं का प्रतिनिधित्व किया तो रावण और कंस, दुर्योधन व शकुनि ने राक्षस प्रवृत्ति को प्रदर्शित किया। बुराई पर अच्छाई की जीत हर युग के हर तरह की रचनाओं में दिखाई जाती रही। लेकिन यह कितना सच है बहस का एक विषय हो सकता है। बहरहाल, असत्य पर सत्य की विजय को बताकर सामान्यजन में विश्वास बनाए रखा गया। अच्छे और बुरे के बीच में संघर्ष सदा से चलता रहा है और आगे भी चलता रहेगा। जीवन निरंतर है। वास्तविकता में धरातल पर देखने पर यह पता चलता है कि जरूरी नहीं कि हर बार धर्म की ही विजय रही हो। इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि अधर्म ने भी पूरी क्रूरता के साथ शासन किया है, अंत फिर चाहे बेशक उसका भी हुआ हो। थोड़े समय के लिए ही सही कई तानाशाह अपनी बर्बरताओं की सारी सीमाओं को तोड़कर मानव सभ्यता पर जबरन राज करते रहे। इनमें से कइयों ने देवता और ऐतिहासिक पुरुष का चोला पहनने की कोशिश की। कई इसमें सफल भी रहे तो कई समय के पैमाने पर असफल। कई बार जानते हुए भी अवाम इस हकीकत से बचता रहा कि उसका शासक देवता नहीं राक्षस है। यह इसलिए भी कि जो शक्तिशाली है उससे कमजोर हमेशा डरता है भयभीत रहता है। भय समाप्त होते ही प्रतिरोध की प्रतिक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
अच्छाई और बुराई का अंतर्द्वंद्व आदमी के अंदर भी हर वक्त, जन्म से लेकर मरण तक, निरंतर जारी रहता है। वहीं इंसान एक स्थान पर देवता तो किसी और परिस्थिति में राक्षस के रूप में कार्य करने लगता है। दोनों प्रवृत्तियां मानव में सदैव विद्यमान रहती है, जिस वक्त जिस पर जो हावी हो जाए। कई बार जो दिखाई देता है वो होता नहीं है और जो होता है वो नजर नहीं आता। कई कठोर दिल वालों को अंदर से अति मुलायम कहा जाता है। नारियल के समान व्यक्तित्व होने की संज्ञा अमूमन दी जाती रही है। व्यक्ति के गुण-अवगुण स्थितियों के द्वारा प्रेरित होते हैं व भावनाओं के द्वारा नियंत्रित। इन्हें परिस्थितिजन्य भी कहा जा सकता है। बदला लेने के लिए, महत्वाकांक्षा के लिए, द्वेषवश, क्रोधवश, ईर्ष्यावश, लालच के कारण, बहकावे में आकर, मूर्खतावश इत्यादि कुछ उदाहरण हो सकते हैं। अच्छे लोगों को भी बुरों की तरह व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है। और बुरी आत्मा कहकर अमूमन हम बच जाते हैं।
विगत सप्ताह मणिरत्नम की फिल्म 'रावण' देखी। इस फिल्म को देखने जाने के पीछे कई कारण थे। निर्देशक का अपना नाम और बेहतरीन रिकार्ड, ऐश्वर्या-अभिषेक का एक साथ आना और 'रावण' शब्द। मणिरत्नम का पूर्व प्रदर्शन देखें तो कथानक के स्तर पर कोई लंबी-चौड़ी कहानी नहीं होती। अंजलि, बाम्बे, रोजा, दिल से इत्यादि में इसे देखा जा सकता है। किसी एक मुद्दे को विस्तारित किया जाता है। मगर मूलकथा होती विशिष्ट है। सुनने में तो आया था कि फिल्म रावण, पारंपरिक रामकथा से प्रेरित है। तीव्र लोकप्रियता हासिल करने के रूप में भी इसे लिया जाता रहा। बहरहाल, सांकेतिक रूप में ही सही बीच-बीच में कभी किसी चरित्र के नाम से तो कभी पृष्ठभूमि से इसे संदर्भित बनाने की कोशिश जरूर की गई है। वैसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। बात यहीं तक सीमित नहीं है और अच्छाई-बुराई की सामान्य परिभाषाओं से यह फिल्म आगे निकलती प्रतीत होती है। यह दीगर बात है कि कई स्थान पर भ्रम उत्पन्न होता है। कभी कथानक के कारण, कहीं डॉयलाग तो कहीं चरित्रों के चेहरों के भाव से। इन सबके बीच एक बात जो मजबूती से उभरती है वो है खूबसूरत फोटोग्राफी। ऐसा लगता है कि मानो डायरेक्टर ने पूरी फिल्म को शुरू से लेकर अंत तक पानी में भिगो दिया। चारों ओर पानी ही पानी। तालाब-नदी-झरने-समुद्र-जलप्रपात का इतना सुंदर विशाल, भव्य व अलौकिक चित्रण किसी और हिन्दी फिल्म में कम से कम मैंने नहीं देखा। बरसात की बूंदें दर्शकों के मन को चंचल कर देती हैं। और पानी की फुहारें पिक्चर हॉल के अंधेरे में बैठे असंख्य सूखे शरीर को जलमय कर देती हैं। इस फिल्म में आंखें और रूमाल की जगह पहने हुए वस्त्र के भीग जाने का अहसास होने लगे तो कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं। जंगल की हरियाली अपने पूरे प्राकृतिक सौंदर्य के साथ उपस्थित है। प्रकृति का यौवन देखने वाले को मदहोश कर सकता है। इसको देखकर पहले तो यह यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि इस तरह का अनछुआ प्राकृतिक जंगल क्या अब भी हिंदुस्तान में कहीं बचा है? फिर यकायक चिंता उभरती है कि आज के बाजार और पूंजीवाद की नजर न लग जाए। वे कहीं इन तक पहुंच न जाए। बेहतरीन कोणों से लिया गया खूबसूरत नजारा। पूरी फिल्म में ताजगी है। सिल्क-सिफॉन, गहनों और डिजाइनर वस्त्रों को देख-देखकर बड़े से लेकर छोटे स्क्रीन तक आंखें थक चुकी थीं। बहुत दिनों बाद भारतीय वेशभूषा अपने असली पहनावे के साथ उपस्थित थी। गरीबी थी मगर उसका भौंडा प्रदर्शन नहीं था। संघर्ष था, समर्पण नहीं। हां, संगीत पक्ष सुना हुआ-सा लगा। एआर रहमान शिखर पर तो हैं मगर नवीनता का सृजन नहीं कर पा रहे।
वर्तमान दौर को संदर्भित बनाते हुए आधुनिक युग के मानव व दानव की कहानी को फिल्म में एक नये रूप में प्रदर्शन की कोशिश की गयी है। यह दीगर बात है कि यह एक गांव-कस्बे के स्तर की बनकर रह गयी। फिर भी इसमें कई नये मुद्दे उभर कर आते हैं। आधुनिक रावण, शासन के दृष्टिकोण से, यहां समाज कहना उचित न होगा, राक्षस तो है, लेकिन यहां उसके राक्षस होने का कारण है। उसका स्पष्टीकरण फिल्म का मोड़ है। वह अपनों के बीच एक सीधा-सादा व सरल इंसान है। और अंत तक पहुंचते-पहुंचते तो उसके गुण देवताओं के समान उपस्थित होकर उसे नायक से भी ऊंचे स्थान पर उठाकर बैठा देते हैं। दूसरी ओर, पारंपरिक नायक के अंदर छिपी राक्षसी प्रवृत्ति का प्रदर्शन जाने-अनजाने में ही सही, मगर हो गया है। पुलिस बर्बरता को सामान्य व सभ्य तरीके से दिखाया गया है। जीवन की हकीकत में तो यह और अधिक वीभत्स है। यूं तो फिल्म के नायक की जीत होती है लेकिन खलनायक की हार नहीं। उलटे वह तो खलनायक के पद से उठकर दर्शकों का भावनात्मक समर्थन लेकर ऐसे गजब ढंग से विदाई लेता है कि नायक की उपस्थिति धूमिल पड़ जाती है। इन सब चक्करों में आम दर्शक भ्रमित होता है।
अभिषेक का व्यक्तित्व एक सामान्य, सरल व भले इंसान का है। फिल्म में वह नायिका को डरा नहीं पाये। सच, उनका क्रोध भी मासूमियत ओढ़कर मीठा हो जाता है। वैसे तो यह ठीक भी है। वरना उनका चरित्र अंतिम दृश्य से लय नहीं बैठा पाता और बिल्कुल नहीं पचता। इसके उलट नायक का आक्रोश अति कठोर और कहीं-कहीं राक्षसी महसूस होता है। ऐश्वर्या का सौंदर्य एक बार फिर आकर्षित करता है। उनके मेकअप पर आलोचकों की दृष्टि जरूर जाती होगी मगर सामान्य दर्शकों की निगाह में उनका सौंदर्य प्रकृति के सौंदर्य के साथ संगीतमय नृत्य करता प्रतीत होता है। ताल में पूरे वैभव के साथ। यह फिल्म कई तरह के प्रश्न पूछती है और उसका जवाब भी देती जाती है। हर इंसान में एक राक्षस बैठा हुआ है। वह अपने-अपने ढंग से काम करता है। हम उसे अमूमन छुपाते हैं। कई बार उसका स्पष्टीकरण देते हुए तर्क-वितर्क के साथ न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी करते हैं। इसमें हम माहिर हैं। जबकि सच पूछा जाए तो सामाजिक व्यवस्था में उसके सही-गलत का फैसला इस बात पर अधिक निर्भर करता है कि वो किस ओर है। शासक की ओर या शासित के साथ, गरीब या अमीर, सुविधा-संपन्न या सुविधाविहीन वर्ग, विजेता या हारा हुआ। बहरहाल, इंसान के अंदर का हैवान सक्रिय होने पर अपनी पूरी शक्ति के साथ उपस्थित होता है। हर शरीर में एक समान। बस उसके रंग-रूप बदल जाते हैं। उधर, नर-नारी के बीच का द्वंद्व, उनके बीच विश्वास-अविश्वास का खेल भी बन जाता है। फिल्म की सफलता-असफलता की बातें करना आज के बाजार में सही ढंग से मुमकिन नहीं। पता ही नहीं चलता क्या खबर है और क्या विज्ञापन। खैर, फिल्मी इतिहास में इस बात के सैकड़ों उदाहरण हैं कि कई फिल्में सिर्फ अपने अंतिम दृश्य के कारण बेहद सफल रहीं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर यह फिल्म आज के तथाकथित भागदौड़ वाली जिंदगी में देखने के बाद याद की जाएगी तो सिर्फ इसलिए कि उसका अंतिम दृश्य दर्शकों को झकझोर देता है।

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