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प्रिय मित्रों, हिन्दीकुंज में रणजीत कुमार के स्तम्भ मंगल ज्ञानानुभाव के अंतर्गत आज प्रस्तुत है - प्रतिकर्म या प्रतिसाद । आशा है कि आप सभी को यह लेख पसंद आएगा । इस सन्दर्भ में आप सभी के सुझाओं की भी प्रतीक्षा रहेगी ।


प्रतिकर्म या प्रतिसाद

जब भी कोई घटना घटित होती है उसके बाद मैं सोंचता हूँ की काश मैंने जो किया वैसा न किया होता तो अच्छा होता. शायद उलझन में आपका धैर्य भी आपकी परीक्षा लेता है. मुझे लगता है भगवान ने हमे इस तरह निर्मित किया है की हमारे हाँथ कुछ नहीं सभी उसकी इच्छा से स्वचलित एवं स्वघटित हो रहा है. ये कुछ नहीं कुछ नहीं नहीं पर ये अपने में अनेक संभावनाओं को समेटे है ठीक उस बीज की तरह जिसे तोड़ने पे कुछ प्राप्त नहीं होता पर उस बीज को बो दें तो अंकुर , वृक्ष और एक विशाल वन बनने की संभावना है. हमें जो सबसे बड़ी शक्ति मिली है वो है चुनाव की आजादी आपके पास विकल्प होते हैं और आपके द्वारा चुना गया विकल्प आपकी दशा और दिशा दोनों तय करता है. यहीं आपकी असली परीक्षा होती है की आप किसी घटना पर कैसे व्यवहार करते हैं क्या आप प्रतिकर्म (reaction) करते हैं या उचित प्रतिसाद (response) देते हैं. प्रतिकर्म और प्रतिसाद में मूल अंतर है प्रतिकर्म में आप विवेक का प्रयोग नहीं करते जब की प्रतिसाद एक वैचारिक मंथन का उपक्रम है. अक्सर मैं प्रतिकर्म में उलझ जाता हूँ जैसे किसी ने मुझे कुछ अपशब्द कहा तो प्रतिउत्तर अपशब्द हो जाता है. घटना और कर्म के बीच जो अंतराल होता है उस के अनुभव मात्र हमें उस अवस्था में ले जाता है जहाँ से हम प्रतिसाद दे पाते हैं. ज्ञात रहे की जो चेतना की अवस्था समस्या उत्पन करती है उसी स्तर पर हम उत्तर नहीं पा सकते हमें दूसरे स्तर पर उत्तर की खोज करनी चाहिए (we can’t solve a problem with the same consciousness that created it. – Einstein). प्रतिसाद और प्रतिकर्म की इस दंगल में आशा है विजय प्रतिसाद की हो.

आपके सत्य के यात्रा का सह पथिक सत्यान्वेषी।


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