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माफ़ कर दो आज देर हो गई आने में
वक़्त लग जाता है अपनों को समझाने में।


किरण के संग संग ज़माना उठ जाता है
.देखना पड़ता है मौका छुप के आने में ।


रूठ के ख़ुद को नहीं ,मुझको सजा देते हो
क्या मज़ा आता है यूं मुझको तड़पाने में ।


एक लम्हे में कोई भी बात बिगड़ जाती है
उम्र कट जाती है उलझन कोई सुलझाने में ।


तेरी ख़ुशबू से मेरे जिस्म "ओ"जान नशे में हैं
"दीपक" जाए भला फिर क्यों किसी मयखाने में



यह रचना दीपक शर्मा द्वारा लिखी गयी है । आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं,दूरदर्शन तथा आकाशवाणी आदि में रचनाओं का प्रसारण हो चुका है । फलकदीप्ती ,मंजर तथा खलिश आदि काव्यसंकलनो का प्रकाशन हो चुका है। आप वर्तमान में भारतीय वस्तु संस्थान के सदस्य है।

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