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हो गम न जहां सुख हो या हो दुःख,
ऐसा इक जग हो अपना।
वो कल कभी तो आयेगा ही,
चाहे आज हो केवल सपना ||

हम जियें जहां औरों के लिए,
कोई न पराया अपना हो।
दुनिया हो दुनिया की खातिर,
बस प्यार ही सुन्दर सपना हो ॥

औरों की खुशी अपने गम हों,
उनके दुःख अपने दर्द बनें ।
हो शत्रु न कोई मीत जहां ,
सब ही सबके हमदर्द बनें ॥

हो झूठ न सच , सत और असत ,
ना स्वर्ग नरक की माया हो ।
बस प्रीति की रीति हो उस जग में,
और प्यार की सब पर छाया हो ॥

हो गम  जहां सुख हो या हो दुःख,
एसा इक जग हो अपना।
वो कल कभी तो आयेगा ही,
चाहे आज हो केवल सपना ||

            ----डा श्याम गुप्त,  सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२.

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