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प्रिय मित्रों , रणजीत कुमार के स्तम्भ 'मंगल ज्ञानानुभाव' के अंतर्गत आज प्रस्तुत है - गुरुदेव . गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आज का लेख समर्पित है - गुरु की महत्ता को . आशा है कि आप सभी को यह लेख पसंद आएगा . इस सन्दर्भ में आप सभी के सुझाओं की प्रतीक्षा रहेगी .




गुरु  पूर्णिमा “ गुरु तुम पूर्ण माँ हो ”
मेरे मन में उठते सवालों की कड़ी  पर कैसे लगे पूर्णविराम. सवाल था सवाल के उत्पत्ति पर जवाब की खोज में आरम्भ हुआ  एक रोचक यात्रा. शब्दों के मायाजाल  से निकल जाना चाहता था मैं अनुभव करना चाहता था आनंद के वो पल. ऐसे में लगा कोई पथप्रदर्शक होता और मैं शोपिंग करने निकल पड़ा आध्यात्मिक बाजार में. मुझे एक गुरु की खोज थी पर क्या पता था की बाजारीकरण के इस दौर में गुरु शब्द अपना अर्थ खो चूका है. मसलन जहाँ सेक्स गुरु , प्रबंधन गुरु , लव गुरु , टेक गुरु , सेल गुरु जैसे शब्द थे वहीँ गुरु घंटाल , मान गए गुरु एवं तुम तो मेरे भी गुरु निकले जैसे प्रचलित वाक्य. तो शब्दों के जंगल में भटक गया मन मेरा और जो श्रद्धा इस शब्द में थी वो विलीन होने लगी.
आधुनिकता  के इस दौर में मुझे एक निहायत निजी गुरु की तलाश थी. पर इससे पहले मैं गुरु शब्द पर कुछ  वैचारिक मंथन चाहता था. ये शब्द मुझे संभावनाओं की कुंजी प्रतीत होता था मुझे गुरु शब्द से अत्यंत लगाव था अनायास मैंने ठान लिया की एक अर्थ अपने इस प्रिय शब्द को समर्पित करूँ. तो जो अर्थ मेरे भाव को जगादे वैसा अर्थ मैं इस शब्द को देना चाहता था. एक व्यापक तर्कसंगत अर्थ. गुरु का अर्थ वो तत्व जो गुमनामी के गुफा से रूहानी रौशनी की दुनिया में आपकी यात्रा का सूत्रधार बने. अंग्रेजी में मैंने इसे कहा गोड दैट रेजोनेट बीदीन यू यानी की वो इश्वर जो अंदर प्रतिध्वनित हो रहा है. तरंगों की एक ऐसी परा भौतिक मिलन जो अंदर के संगीत को उजागर करदे. गुरु वो शिल्पकार है जो हमारे स्थूल शरीर से इश्वर की प्रतिमूर्ति को जीवंत रूप देता है. गुरु की महिमा इश्वर से भी महान है क्यूंकि भगवान से परिचय कराने का माध्यम गुरु कृपा ही है.
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काको लागूं पायं। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय।
गुरु एक मनोशारीर यंत्र नहीं अपितु एक आध्यात्मिक तत्व है शायद इसलिए अंग्रेजी शब्दकोष में इसका कोई विकल्प नहीं. ये भारतीय ज्ञान ग्रंथों का ही विस्तार है. गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उस गुरु तत्त्व को मेरा सादर अभिनन्दन जिसकी मार्गदर्शन में जीने का अर्थ और उद्देश्य की खोज जारी है. एक काव्य पुष्प गुरु के उस स्वरुप को......
गुमनामी से रूहानी दुनिया में मेरा प्रवेश
यही तो गुरुदेव  का एक मात्र आदेश
की त्याग  कर अपना शीश 
देकर अहं  का उपहार 
एक मौन  निवेदन उत्साहपूर्ण 
मनाओ गुरु तत्व का त्यौहार
स्मरण रहे  आकांक्षा पूर्ण होने की
और अभिलाषा  आनंद की
जब भक्ति  भाव से हो जायेगी ओत प्रोत 
अंदर कहीं फूटेगी एक अमृत श्रोत 
ये अमृत श्रोत विस्तार है कृपा का
शिष्य प्रसुति  वेदना गुरु पूर्ण माँ  का
आज ही पुनः जन्मा मैं शिष्य नवजात  हूँ 
अपने नव जीवन का ईश्वरीय प्रभात हूँ ................


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