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प्रिय मित्रों , हिन्दीकुंज में अब एक नया स्तम्भ शुरू होने जा रहा है - 'मंगल ज्ञानानुभाव'
यह कुछ ऐसे विचारों पर मनन एवं चिंतन है , जो ज्ञान और अनुभव के सागर से चुने गए है। यह रणजीत कुमार मिश्र जी, द्वारा हर मंगलवार को लिखा जायेगा । रंजीत कुमार झारखण्ड राज्य हजारीबाग के मूल निवासी हैं। आप ने जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान लखनऊ से डॉक्टरेट की उपाधि अर्जित की है। वर्तमान में उपसाला विश्वविद्यालय स्वीडेन में शोधरत हैं. आपकी रूचि काव्य में है आपने हिंदी एवं अंग्रेजी में निरंतर लिखा है. काव्य के अलावा आप समसामयिक विषयों पर एवं युवाओं के लिए लेख भी लिखते आ रहे हैं. आप की रचना विविध विषयों पर होती है मुख्यतः समाज, युवा, आध्यात्म एवं विज्ञान आदि ।

तो मित्रों, आज का स्तम्भ लेख है - 'अंतराल' । आशा है कि आप सभी को यह पसंद आएगा ।

मुझे खेद है की शब्दों के मायाजाल में डुबकी लगाते हुए कहीं मैं कोई गलती न कर दूँ . लिखने से मुझे डर लगता था पर अनायास जब मैंने मौन के सागर में गोता लगाया उसके अविश्मरणीय अनुभव को आपके समक्ष रखने का प्रयास कर रहा हूँ. गुरूजी कहते थे शब्द कुल्फी की डंडी है भाव कुल्फी की भाँती , कोई डंडी को लेके घूमता नहीं फेंक देता है . सत्य है उनका ये वाक्य मैंने अनुभव किया. लेकिन शब्द जो मानस पटल पर आते हैं वो भी आवारा नहीं बल्कि हर शब्द के पीछे गहरी मौन है. अव्यक्त व्यक्त हो जाता है शब्दों के शसक्त माध्यम से. विचार और भाव को जोड़ता है शब्द. मेरी मनसा आपको दुविधा में डालने की नहीं बस अपनी परेशानी की व्याख्या है . अंतराल महत्वपूर्ण है वो समय जो भाव और विचार के बिच की कड़ी है. वही अंतराल के सन्नाटे में उठती प्रसव पीड़ा शब्द को जन्म देती है. ये शब्द साधारण से प्रतीत होते हैं पर इनकी शक्ति असीम है. अनुभव किया है मैंने उस अंतराल का शायद ये वो क्षणिक अनुभूति है जो बिलकुल निजी है और शब्दों की कसौटी पर इन्हें तौलना बेईमानी होगी.

तो ये शब्द माध्यम मात्र है अनुभव की उड़न तस्तरी पर आपके कदम को पहुँचाने का. आइये इस यात्रा में हम हमसफ़र और हमकदम बन उन खिड़कियों को खोलें जो अनुभव के विस्तृत आकाश पर पंछी बन हमें उड़ने को उत्साहित करे ................



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