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कबीर की भाषा 


कबीर मूलतः संत थे .उन्होंने निराकार ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की .उनका विश्वास था कि सच्चे प्रेम और ज्ञान से ही ईश्वर मिल सकते हैं .उसके लिए नाम स्मरण और गुरु - शरण दोनों आवश्यक हैं .उन्होंने गुरु को ईश्वर से ऊँचा स्थान दिया .उन्होंने नारी और माया दोनों का प्रबल विरोध किया .ए दोनों साधक को उसके पथ से हटाते हैं .कबीर की भाषा अनमेल खिचड़ी है .
हिंदी भाषा के साहित्य में भी विश्वस्तर पर बड़ी तेजी से विकास हो रहा है, उसमें चिंतनपरक साहित्य के रुप में हिन्दी कविताओं, लघुकहानियों, आधुनिक उपन्यासों तथा लेखों की संख्या विश्वस्तर पर बहुत बढ़ी है। आज हिंदी की एक अंतरराष्ट्रीय बिरादरी विकसित हो रही है, जिसमें एक ओर जहां हिन्दी विदेशों में उनके विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में स्थान बना चुकी है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी साख बनाए रखने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिन्दी अपनाने के प्रति प्रतिबद्ध सी जान पड़ती हैं। 
एक विदेशी भाषा के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल होने के साथ साथ विश्व के विश्वविद्यालयों, संगठनों व अन्य शैक्षणिक समुदायों में हिन्दी का उपयोग निरंतर बढ़ रहा है। आज विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैंकड़ों छोटे-बड़े हिन्दी शोध केन्द्रों में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन के कार्य सुचारु ढंग से चल रहे हैं। विदशों में इंडिया स्टडी सेंटरों के माध्यम से विदेशियों को हिन्दी भाषा से परिचित कराकर भारत से जोड़ने के प्रयास चल रहे हैं। इस समय कुल 40 से अधिक देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम के तहत भाषा के अलावा हिन्दी में भारतीय संस्कृति, इतिहास, समाज आदि के विषय में भी पढ़ाया जा रहा है। अमेरिका के येन विश्वविद्यालय में सन् 1815 से हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था चली आ रही है। इसके अलावा वहां हिन्दी अध्यापन के कुल 114 केंद्र हैं। इसी तरह रुस में भी सात से अधिक हिन्दी शोध संस्थान हैं।  
भारत पुनः विश्व गुरु की ओर अग्रसर :- भारत को पुनः एक महान राष्ट्र बनना है, विश्व गुरु का स्थान प्राप्त करना है, उसके लिए जिन श्रेष्ठ व्यक्तियों की आवश्यकता बड़ी संख्या में पड़ती है, उनके विकसित करने के लिए यह संस्कार प्रक्रिया अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।। प्रत्येक विचारशील एवं भावनाशील को इससे जुड़ना चाहिए।  जन्म – जन्मांतर में किये हुए शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों से यह जीव बंधा है तथा इस मनुष्य शरीर में पुन: अहंता, ममता, आसक्ति और कामना से नए – नए कर्म करके और अधिक जकड़ा जाता है । 

आगरे में एक महाजन रहता था . वह था तो बड़ा धनपति परन्तु कंजूसी में अपनी शानी नहीं रखता था . एक दिन उसके यहाँ एक कवि आये और उन्हें बड़ी सुन्दर कविता सुनाई . महाजन ने कहा यदि कल तुम हमें सुन्दर

सी कविता सुनाओगे तो तुम्हे खुश कर दूंगा . उसकी कोठी पर दूसरे दिन वह कवि आये सुन्दर सी कविता कही . सायंकाल जब इनाम लेने को उसके मकान पर गए तो महाजन ने आश्चर्य भरे स्वर में कहा - कहो कौन हो ? उन्होंने महाजन को उनका पुरस्कार देने का वायदा याद दिलाया . कंजूस महाजन ने कहा - इसमें लेने दने की क्या बात है . तुमने मुझे कविता सुनाकर खुश कर दिया . मैंने पुरस्कार देने का वायदा करके तुम्हे खुश किया . इतना कहकर महाजन अन्दर चला गया .

जब निराश होकर कवि जी लौट रहे थे ,तभी मार्ग में उधर से आते हुए बीरबल मिले . उदास मुँह देखकर बीरबल ने चिंता का कारण पूछा . कवि ने सब घटना कह सुनाई . बीरबल ने धीरे से न जाने कवि से क्या कहा और उनको पुरस्कार  दिलाने का आश्वासन दिया . दूसरे दिन बीरबल ने उस कंजूस महाजन को भोजन का निमंत्रण दिया . महाजन ने न्योता मिलते ही भोजन बंद कर दिया और भूख मारने लगा . दूसरे दिन समय से पूर्व ही महाजन बीरबल के मकान पर पहुँच गया . धीरे - धीरे समय टलता गया और इसी प्रकार बातों - बातों में रात्रि ने ग्यारह बज गए परन्तु भोजन का कहीं निशान ही न दिखाई देता था . अब महाजन  से न रहा गया तो झुँझला कर बोले कुछ भोजन का डौल है या निमंत्रण करके भूखों मारने का इरादा है . बीरबल बोले - सेठ जी !  इसमें खाने खिलाने का क्या प्रश्न है . मैंने आपको निमंत्रण देकर खुश किया और काम पूरा हो गया . सामने बैठे हुए वे कवि जी मुस्करा रहे थे . उन्ही देखकर बेचारा महाजन पानी - पानी हो गया और तुरंत अपना कीमती दुशाला और १००० रुपये कवि जी को दे दिया .



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