0
Advertisement

एक बार फिर से पंख फ़ैलाने दो

दूर आकाश में उन्मुक्त हो उड़ जाने दो

मुझे पिंजड़े में कैद कर तुम क्या पाओगे

मेरे धैर्य को कब तक आजमाओगे

मैं तो पंक्षी हूँ एक न एक दिन उड़ जाऊँगा

देखना फिर तेरे हाँथ कभी न आऊंगा

मुझे घृणा है जंजीरों में कैद होने से

और पिंजड़े में गुलामी का बोझ ढोने से

मैं तो जामवंत के खोज में हूँ

जो उड़ने पे करदे मुझे मजबूर

और समस्त शक्ति को समेट

तोड़ डालूं बंधन सारे

उड़ जाऊं नील गगन में सुदूर

मेरे पदचिन्ह विलीन हो जायेंगे

आकाश के विस्तार में

तरस गए हैं नयन मेरे

उस जामवंत के इन्तेज़ार में ...............

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top