हे जलासिंधू - नेत्रा देशपाण्डेय की कविता

मैं पिक बन गाती डाल-डाल ,
तू आता रहें हर बार - बार,
तुझे देखती रहू मैं भर नजर,
तू कहे तडपे मुझे हाल - हाल॥

तू आने से सृष्टि भर जाती नव ज्वार
रोमांचित होता कण - कण,
उल्हसीत होता गीत-गुंजन,
तू आया करें बस मेहरनज़र॥

आषाढ़ तू हैं, ग्रीष्म तू हैं,
मनभावन का श्रीकृष्ण तू हैं,
तेरे आने से बने सृष्टि नववधू,
बस आए अब तू हे जलासिंधू॥
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यह कविता नेत्रा देशपाण्डेय द्वारा लिखी गयी है,जो कि एम.ए (हिंदी) की छात्रा है। आप हिंदी के साथ- साथ मराठी भाषा में भी कविता लिखती है।






1 टिप्पणियाँ:

pranav ने कहा…

tuzi kavita aali khup aanand zala
aashach kavita tuzy blok var yeot
hich subhecha
Regards
PRANAV KULKARNI

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