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काया जरा सी क्या मेरी थकी,
अपने बच्चों को ही हम अखरने लगे,
जिनकी खुशियों पे जीवन निछावर मेरा,
मेरे मरने की घडियाँ वो गिनने लगे //

मेरे मरने से पहले वो भूले मुझे,

किन्तु, मेरी कमाई पे लडने लगे,
जनाजा मेरा उठा ही नही ,

जिन्दा घर से ही बाहर, वो करने लगे //

नजरे कमजोर मेरी हुई क्या जरा,
आँख से काजल मेरी वो चुराने लगे,
जतन से जो भी मैने इकट्ठा किया,
आज बाजार में वो लुटाने लगे //

जिनको काँधें पर अपने घुमाया वही,
काँधा देने से मुझको मुकरने लगे,
मेरी सारी कमाई हडपकर के वो,
मेरे कफ़न को ही मुझसे लडने लगे //

जिनको अपने लहू से सींचा कभी,
हम उन्ही को बेगाने से लगने लगे,
जिस घरौंदें को हमने बनाया उसी,
के अँधेरे कोने में सडने लगे //

जिन्दगी भर महफिल में रहते थे हम,
अब तन्हाई मे तिल-तिल मरने लगे,
कभी गैरों से भी डरते नही,
अब अपने ही सायों से डरने लगे //

आशीष देते हम जिनको अभी,
उनके मुख से अंगारे निकलने लगे
,
कल तलग फूल थे जो मेरे लिये
,
वही शूल बन मुझको चुभने लगे //

जिनके रूदन से राते कटी जागते,

मेरी खाँसी से सपने उचटने लगे,

रात कटती है मेरी ठिठुरते हुए,

फटी कथरी रजाई में सोने लगे//

झाडू पोछा भी घर मे करते हैं हम,
फिर भी खुद गन्दगी में रहने लगे,
मालिकों के मेरे अब बढे ठाट हैं ,
फटे चिथडे हम उनके पहनने लगे //

रास्ता हमने जिनको दिखाया वही,
अपनी मंन्जिल का रोडा समझने लगे,
उनकी नजरों में बूढा औ बेकार हूँ ,
पढ लिखकर सयाने वो होने लगे //

दीप दिवाली के उनके जले है अलग,
आँसुओं में अलग हम तो जलने लगे,
होली में अपनो संग है वो मगन,
उनकी खुशियों में हम खुश होने लगे//

अपने मुह का निवाला खिलाया जिन्हे ,
दाने-दाने को हमको तरसाने लगे,
घर का डागी भी लंच कर है चुका,
हम उसी की बची को तरसने लगे//

सबकी जूठन ही मेरे नसीबा मे है,
अब तो अधपेट ही हम सोने लगे ,
दूध छाती का जिनको पिलाया वही,
नाग बनकर हम को ही डसने लगे//

मेरे कलेजे के टुकडे मेरे,
कलेजे मे ही घाव करने लगे,
जवानी का जीवन खतम क्या हुआ,
बुढापे मे तिल-तिल हम मरने लगे//

प्राण काया से मेरे निकलते नही,
अपने मरने की मन्नत हम करने लगे,
जीवन रौशन हो खुशियोँ से उनका सदा,
हम तो चिरनिद्रा में खोने लगे //





यह कविता बृजेंद्र
श्रीवास्तव द्वारा लिखी गयी है , जो आई .आई .टी कानपुर में कार्यरत है। आपकी ग़ज़ल ,गीत ,मुक्तक कवितायेँ तथा लेख आदि विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं तथा आकाशवाणी द्वारा प्रसारित होती रहती है।

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  1. अपने मुह का निवाला खिलाया जिन्हे ,
    दाने-दाने को हमको तरसाने लगे,
    घर का डागी भी लंच कर है चुका,
    हम उसी की बची को तरसने लगे//
    सबकी जूठन ही मेरे नसीबा मे है,
    अब तो अधपेट ही हम सोने लगे ,
    दूध छाती का जिनको पिलाया वही,
    नाग बनकर हम को ही डसने लगे//

    बेहद मार्मिक यथार्थ बोध कराती रचना…………………आँख मे आँसू आ गये इतनी संवेदन्शील रचना है……………कल के चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट होगी।

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  2. जवानी का जीवन खतम क्या हुआ,
    बुढापे मे तिल-तिल हम मरने लगे//
    प्राण काया से मेरे निकलते नही,
    अपने मरने की मन्नत हम करने लगे,
    जीवन रौशन हो खुशियोँ से उनका सदा,
    हम तो चिरनिद्रा में खोने लगे //



    ओह बृजेंद्र जी बुजुर्ग माता - पिता की सारी वेदना भर दी आपने इन पंक्तियों में .....

    बेहद मार्मिक .....!!

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  3. वृद्धावस्था की व्यथा की सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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