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लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में

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  1. बहुत सुंदर गजल ओर सभी शेर एक से बढ कर एक, धन्यवाद

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  2. kai baar pehle bhi padhi thee... eak bar phir padhi.. bahut bahut abhar

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  3. गुड्डोदादीजुलाई 09, 2010 9:41 am

    बहादुर शाह जी की गजल
    दो गज जमीन भी ना मिली कू ए aage nahin likha jaata

    उत्तर देंहटाएं

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