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लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में  - बहादुर शाह ज़फ़र
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में - बहादुर शाह ज़फ़र

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में कह दो इन हसरतों से कहीं ...

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गर्म लोहा - हरिवंशराय बच्चन की कविता
गर्म लोहा - हरिवंशराय बच्चन की कविता

गर्म लोहा पीट, ठंडा पीटने को वक्त बहुतेरा पड़ा है। सख्त पंजा, नस कसी चौड़ी कलाई और बल्लेदार बाहें, और आँखें लाल चिंगारी सरीखी, चुस्त औ तीख...

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शारदे माँ ! - बृजेन्द्र श्रीवास्तव 'उत्कर्ष' की कविता
शारदे माँ ! - बृजेन्द्र श्रीवास्तव 'उत्कर्ष' की कविता

शारदे माँ! शारदे माँ! शारदे माँ! ज्ञान का भंडार दे माँ! शारदे माँ! इस धरा के अंधकार में, खो न जाऊ हे माँ!/ ले अपने आँचल में हमको, ज्य...

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तीन मछलियां - पंचतंत्र की  कहानियां
तीन मछलियां - पंचतंत्र की कहानियां

एक नदी के किनारे उसी नदी से जुडा एक बडा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे...

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व्यंग्य मत बोलो - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता
व्यंग्य मत बोलो - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता

व्यंग्य मत बोलो। काटता है जूता तो क्या हुआ पैर में न सही सिर पर रख डोलो। व्यंग्य मत बोलो। अंधों का साथ हो जाये तो खुद भी आँखें बंद कर लो ...

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क्षीण मर्म - दयाशंकर  चौधरी की कविता
क्षीण मर्म - दयाशंकर चौधरी की कविता

काश कोई मुझे 'गिफ्ट' दे जाता, मै भी उसे सजाता ,उसकी शोभा बढ़ाता। नज़रों की गहराइयों में उतारता उसे, इतराता जब भी देखता उसे। मन में उ...

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बापू - सुमित्रानंदन पंत की कविता
बापू - सुमित्रानंदन पंत की कविता

चरमोन्नत जग में जब कि आज विज्ञान ज्ञान, बहु भौतिक साधन, यंत्र यान, वैभव महान, सेवक हैं विद्युत वाष्प शक्ति: धन बल नितांत, फिर क्यों जग में उ...

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मुर्गाबियों के शिकारी - असगर वजाहत की कहानी
मुर्गाबियों के शिकारी - असगर वजाहत की कहानी

अधेड़ उम्र लोगों को आसानी से किसी बात पर हैरत नहीं होती। जीवन की पैंतालीस बहारें या पतझड़ इतने खट्टे-मीठे अनुभवों से उसका दामन भर देती है...

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वरदान (अध्याय ५) - प्रेमचंद के उपन्यास
वरदान (अध्याय ५) - प्रेमचंद के उपन्यास

शिष्ट-जीवन के दृश्य दिन जाते देर नहीं लगती। दो वर्ष व्यतीत हो गये। पण्डित मोटेराम नित्य प्रात : काल आत और ...

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तेंतर - प्रेमचंद की कहानी
तेंतर - प्रेमचंद की कहानी

1 आखिर वही हुआ जिसकी आंशका थी; जिसकी चिंता में घर के सभी लोग और विषेशत: प्रसूता पड़ी हुई थी। तीनो पुत्रो के पश्चात् कन्या का जन्म हुआ। मा...

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गजल - ऐ - शरारत / नेत्रा देशपाण्डेय
गजल - ऐ - शरारत / नेत्रा देशपाण्डेय

"कविता तो कविता होती हैं, नहीं कोई खेल, जिस किसी के ह्रदय से आए , उससे नहीं किसी का मेल" ------------------ '' ग...

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परशुराम की प्रतीक्षा (खंड २) - रामधारी सिंह दिनकर
परशुराम की प्रतीक्षा (खंड २) - रामधारी सिंह दिनकर

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ? हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ? यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ? दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गि...

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खोखले रिश्ते - बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष" की कविता
खोखले रिश्ते - बृजेन्द्र श्रीवास्तव "उत्कर्ष" की कविता

काया जरा सी क्या मेरी थकी , अपने बच्चों को ही हम अखरने लगे , जिनकी खुशियों पे जीवन निछावर मेरा , मेरे मरने की घडियाँ वो गिनने लगे /...

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चिंता और चिंतन - मनोज सिंह
चिंता और चिंतन - मनोज सिंह

शब्दों में समरूपता क्या उनके अर्थों को भी नजदीक लाती है? मनुष्यों में यह दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जुड़वां बच्चों के व्यवहार मे...

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