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नन्दनक नन्दन कदम्बक तरु तर, धिरे-धिरे मुरलि बजाब।
समय संकेत निकेतन बइसल, बेरि-बेरि बोलि पठाव।।
साभरि, तोहरा लागि अनुखन विकल मुरारि।
जमुनाक तिर उपवन उदवेगल, फिरि फिरि ततहि निहारि।।
गोरस बेचरा अबइत जाइत, जनि-जनि पुछ बनमारि।
तोंहे मतिमान, सुमति मधुसूदन, वचन सुनह किछु मोरा।
भनइ विद्यापति सुन बरजौवति, बन्दह नन्द किसोरा।।

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  1. बहुत सुन्दर वर्णन है, वय सन्धि का एवं नन्द नन्दन का यह कहने की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है, विध्यापति के वर्णन पर क्या टिप्पणी ??

    --- दोनों पद के कला पक्ष देख कर सिद्ध होता है कि छंद में तुकान्त कभी आवश्यक नहीं था( प्रस्तुत एक पद,नन्दनक...,तुकान्त व अन्य-सैसब जौवन...,अतुकान्त है.) हिन्दी में छन्द बद्ध कविता के प्रचारक, अतुकान्त के विरोधी कविता के इतिहास से परिचित नहीं हैं.

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