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अंतिम शब्द मेरे हों जरूरी तो नहीं

कभी मौन की भी गूँज होते हैं

एक प्रेम का स्पर्श कभी

जाने कितने बीज़ बोते हैं

शब्द भावनाओं को बांधेंगे कैसे

शब्दों की भी तो सीमा होती है

पर भाव तो स्वछंद युहीं

चेहरे पर प्रगट होती है

कभी आंसू बन के बहते हैं

कभी चेहरे की लाली होते हैं

कभी उमंग का उत्सव ये है

कभी अकेलेपन में रोते हैं

उसी भाव का मैं भी पुजारी हूँ

मैं एक भावुक क्रन्तिकारी हूँ

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