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प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।।


जब मैं था तब हरि‍ नहीं, अब हरि‍ हैं मैं नाहिं।

प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।


जिन ढूँढा तिन पाइयॉं, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।।


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा अपना, मुझ-सा बुरा न कोय।।


सॉंच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हिरदै सॉंच है, ताके हिरदै आप।।


बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।

हिये तराजू तौल‍ि के, तब मुख बाहर आनि।।

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  1. जब मैं था तब हरि‍ नहीं, अब हरि‍ हैं मैं नाहिं।

    प्रेम गली अति सॉंकरी, तामें दो न समाहिं।।

    ये तो समस्त आद्यात्मिकता का ,भक्ति का सार है

    उत्तर देंहटाएं
  2. कबीर के दोहों में मानव प्रेम,सौहार्द,भक्ति,नीति,ज्ञान की प्रबलता की गूँज सुनाई देती है।

    उत्तर देंहटाएं

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