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संशोधित और प्रवर्धित संस्करण के संबंध में दो बातें।


कई संस्करणों के उपरांत इस पुस्तक के परिमार्जन का पहला अवसर मिला, इसमें कुछ आवश्यक संशोधन के अतिरिक्त बहुत-सी बातें बढ़ानी पड़ीं।
'आदिकाल' के भीतर वज्रयानी सिध्दों और नाथपंथी योगियों की परंपराओं का कुछ विस्तार के साथ वर्णन यह दिखाने के लिए करना पड़ा कि कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण संतमत के प्रचार के लिए किस प्रकार उन्होंने पहले से रास्ता तैयार कर दिया था। दूसरा उद्देश्य यह स्पष्ट करने का भी था कि सिध्दों और योगियों की रचनाएँ साहित्य कोटि में नहीं आतीं और योगधारा काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं मानी जा सकती।
'भक्तिकाल' के अंतर्गत स्वामी रामानंद और नामदेव पर विशेष रूप से विचार किया गया है; क्योंकि उनके संबंध में अनेक प्रकार की बातें प्रचलित हैं। 'रीतिकाल' के 'सामान्य परिचय' में हिंदी के अलंकार ग्रंथों की परंपरा के उद्गम और विकास को कुछ अधिक विस्तार के साथ दिखाया गया है। घनानंद आदि कुछ मुख्य कवियों का आलोचनात्मक परिचय भी विशेष रूप से मिलेगा।
'आधुनिक काल' के भीतर खड़ी बोली के गद्य का इतिहास, इधर जो कुछ सामग्री मिली है उसकी दृष्टि से एक नए रूप में सामने लाया गया है। हिंदी के मार्ग में जो-जो विलक्षण बाधाएँ पड़ी हैं, उनका भी सविस्तार उल्लेख है। पिछले संस्करणों में वर्तमान अर्थात् आजकल चलते हुए साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियों का संकेत मात्र करके छोड़ दिया गया था। इस संस्करण में समसामयिक साहित्य का अब तक का आलोचनात्मक विवरण दे दिया गया है जिससे आज तक के साहित्य की गतिविधि का पूरा परिचय प्राप्त होगा।
आशा है कि इस संशोधित और प्रवर्धित रूप में यह इतिहास विशेष उपयोगी सिद्ध होगा।

अक्षय तृतीया रामचन्द्र शुक्ल
संवत् 1997

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