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महेंद्रभटनागर-विरचित काव्य-कृति 'जूझते हुए' में मनुष्य की संघर्ष-गाथा को वाणी प्रदान की गयी है। सन्‌ १९८४ में, 'किताब महल', इलाहाबाद से प्रकाशित प्रस्तुत कृति में सन्‌ १९७२ से १९७६ तक की रचित ४५ कविताएँ समाविष्ट हैं। कथ्य की दृष्टि से इसमें अनेक प्रकार की कविताएँ संकलित हैं। यथा — आत्म-बोध की कविताएँ, समकालीन
विडम्बनाओं को प्रत्यक्ष करती व्यंग्य कविताएँ, आपात्काल का विरोध करते बुलन्द स्वर, श्रमजीवी वर्ग की वाम-चेतना आदि। प्रकृति और प्रणय को भी इसमें स्थान मिला है। प्रगतिवादी-जनवादी हिन्दी-कविता की कृति 'जूझते हुए' कवि महेंद्रभटनागर के कविता-सरोकारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करत्ती है। कवि की पहचान को रेखांकित करती दो कविताएँ यहाँ उद्‌धृत हैं।
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कश-म-कश
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बरसों से नहीं देखा —
सूर्योदय / सूर्यास्त
चाँद-तारों से भरा आकाश,
नहीं देखा
बरसों से नहीं देखा !
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कलियों को चटकते,
फूलों को महकते
डालियों पर झूमते,
तितलियों-मधुमक्खियों को
चूमते !
बरसों से नहीं देखा !
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मेह में न्हाया न बरसों से
पुर-जोश कोई गीत भी गाया
न बरसों से!
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न देखे —
एक क्षण भी,
मेहँदी से महमहाते हाथ गदराए,
महावर से रँगे
झनकारते
दो - पैर भरमाए !
न देखे
आह, बरसों से !
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कुछ इस क़दर
उलझा रहा
ज़िन्दगी की कश-म-कश में —
देखना / महसूसना
जैसे तनिक भी
था न वश में !
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संधान

इस बीच :
जीये किस तरह —
हम ही जानते हैं !
कितना भयावह था
लहरता-उफ़नता-टूटता सैलाब —
हम ही जानते हैं !
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अर्थ :
जीवन का : जगत् का
गूढ़ था जो आज तक
अब हम
उसे अच्छी तरह से
हाँ, बहुत अच्छी तरह से
जानते हैं !
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असंख्य परतों को लपेटे आदमी
अब पारदर्शी है,
भीतर और बाहर से
उसे हम
सही, बिलकुल सही
पहचानते हैं !
.

आओ, तुम्हें —
हाँफ़ते, दम तोड़ते
तूफ़ान की गाथा सुनाएँ !
जलती ज़िन्दगी से जूझते
इंसान की गाथा सुनाएँ !

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