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ओ भवितव्य के अश्वो !

तुम्हारी रास

हम आश्वस्त अंतर से सधे

मज़बूत हाथों से दबा

हर बार मोड़ेंगे !

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वर्चस्वी, धरा के पुत्र हम

दुर्धर्ष, श्रम के बन्धु हम

तारुण्य के अविचल उपासक

हम तुम्हारी रास

ओ भवितव्य के अश्वो !

सुनो, हर बार मोड़ेंगे !

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ओ नियति के स्थिर ग्रहो !

श्रम-भाव तेजोदृप्त

हम अक्षय तुम्हारी ज्योति

ग्रस कर आज छोड़ेंगे !

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तितिक्ष अडिग

हमें दुर्ग्रह नहीं अब अंतरिक्ष अगम्य !

निश्चय ओ नियति के

पूर्व निर्धारित ग्रहो !

हम....हम तुम्हारी ज्योति

ग्रस कर आज छोड़ेंगे !

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ओ अदृष्ट की लिपियो !

कठिन प्रारब्ध हाहाकार के अविजेय दुर्गो !

हम उमड़ श्रम-धार से

हर हीन होनी की लिखावट को मिटाएंगे,

मदिर मधुमान श्रम संगीत से

हम हर तबाही के अभेदे दुर्ग तोड़ेंगे !

ओ भवितव्य के अश्वो !

तुम्हारी रास मोड़ेंगे !

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