दरिंदा
आदमी की आवाज़ में
बोला
स्वागत में मैंने
अपना दरवाज़ा
खोला
और दरवाज़ा
खोलते ही समझा
कि देर हो गई
मानवता
थोडी बहुत जितनी भी थी
ढेर हो गई !
» मुख्यपृष्ठ »
भवानीप्रसाद मिश्र
» भवानीप्रसाद मिश्र की कविता - दरिंदा
भवानीप्रसाद मिश्र की कविता - दरिंदा
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)






4 टिप्पणियाँ:
waah..........ati sundarta se varnan kiya hai manviyata ke hras ka.
वाह .....बहुत खूब
bhawani ji ki rachna me shabdon ka chayan aur sahaj saral pravah,ek alag hi baangi hai
akhilesh
aaj ak adbhat site mili(hindi-kunj}anand aagaya-sudarshan
एक टिप्पणी भेजें
आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !