5
Advertisement


मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी…
और गलियाँ इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर

हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआ
दीवारें-किचकिचाती सी
और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है

यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देख कर यह और गरमाती
और हर द्वार के मुँह से
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते

जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता…

शंख घंटों के साँस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती

पर नींद में भी बहस ख़तम न होती
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है….

एक टिप्पणी भेजें

  1. BEHTAREEN ! MASHAALLH ! I SALUTE YOU BOTH... AMRITA PRITAM AND YOUR KOSHISH.

    उत्तर देंहटाएं
  2. यही तो अमृता जी की खासियत है……………………एकदम बेजोड अनूठी शैली।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही अच्छी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  4. han... sach hi to hai... main ye pahle bhi pad chuka hun par dubara padne m pahli baar jaisi tajagi,, aur agli baar padne jaisi nhi samajh... lagi...

    apki kavita main apni website m dalna chahta hun taaki jyada se jyada logon tak pahunche ye kavita..http://www.kagajkalam.com/cost-of-living/
    sk suggestion bhi h, sir, aapki kavita ka link kafi bada hai, jisse jyada se dyada logon tak nhi panhuchati ye. aap permalink setting m jaake isse short kijiye..

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top