2
Advertisement
दोनों जहाँ देके वो समझे ये ख़ुश रहा
यां आ पड़ी ये शर्म की तकरार क्या करें

थक थक के हर मक़ाम पे दो चार रह गये
तेरा पता न पायें तो नाचार क्या करें

क्या शमा के नहीं है हवा ख़्वाह अहल-ए-बज़्म
हो ग़म ही जां गुदाज़ तो ग़मख़्वार क्या करें

एक टिप्पणी भेजें

  1. it is so nice... i
    am very glad to see thees poets on the net....i am a great fan of ghalib and firaq.

    उत्तर देंहटाएं
  2. खिला न कोई गुंच-ए-ग़ुल अबके शाख़सार..?
    लो शाख़ बंदी हो तो नौबहारें क्या करें.....

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top