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जीने के लिए : जिजीविषा की अभिव्यक्‍ति — महेंद्र भटनागर



‘जीने के लिए’ में कवि महेंद्रभटनागर की सन्‌ १९७७ से १९८६ के एक दशक के बीच लिखित चालीस कविताएँ संगृहीत हैं। ‘जिजीविषा’ कवि महेंद्र की काव्य-प्रवृत्ति का मूल स्वर रहा है। कवि ने जीवन और जगत्‌ से प्यार को एक उदात्त भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित किया है। कवि महेंद्रभटनागर की अपनी एक पृथक विशिष्ट और निश्चित पहचान है।

(1) जीने के लिए
दहशत दिशाओं में
हवाएँ गर्म
गंधक से, गरल से;
किन्तु मंज़िल तक
थपेड़े झेलकर
अविराम चलना है !
शिखाएँ अग्नि की
सैलाब-सी
रह-रह उमड़ती हैं ;
किन्तु मंज़िल तक
चटख कर टूटते शोलों-भरे
वीरान रास्तों से
गुज़रना है,
तपन सहना
झुलसना और जलना है !
सुरंगें हैं बिछी
बारूद की
चारों तरफ़
नदियों पहाड़ों जंगलों में ;
किन्तु मंज़िल तक
अकेले
खाइयों को ; खंदकों को
लौह के पैरों तले
हर बार दलना है !

(2) आग्रह
आदमी को
मत करो मजबूर !
इतना कि
बेइंसाफ़ियों को झेलते
वह जानवर बन जाय !
या
बेइंतिहा
दर्द की अनुभूतियों को भोगते
वह खण्डहर बन जाय !
आदमी को
मत करो मज़बूर
इतना कि उसको
ज़िन्दगी
लगने लगे
चुभता हुआ
रिसता हुआ
नासूर !
आदमी को
मत करो
यों
इस क़दर मजबूर !

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