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उड़ गये

ज़िन्दगी के बरस रे कई,

राग सूनी

अभावों भरी

ज़िन्दगी के बरस

हाँ, कई उड़ गये !

लौट कर

आयगा अब नहीं वक़्त

जो धूल में, धूप में

खो गया,

स्याह में सो गया !

शोर में

चीखती ही रही ज़िन्दगी,

हर क़दम पर विवश,

कोशिशों में अधिक विवश !

गा न पाया कभी

एक भी गीत मैं हर्ष का,

एक भी गीत मैं दर्द का !

गूँजता रव रहा

मात्र : संघर्ष....संघर्ष... संघर्ष !

विश्रान्ति के

पथ सभी मुड़ गये !

ज़िन्दगी के बरस,

रे कई

देखते...देखते उड़ गये !

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