हरिवंशराय बच्चन की कविता 'था तुम्हें मैंने रुलाया !'

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!




5 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

gazab ,amazing.

susheel kashyap ने कहा…

mind blowing

manjeet ने कहा…

ye jo poem hai mere life par ek dam sahi h .thank's all of u

बेनामी ने कहा…

vo baat nahi jo honi chaiye

Govind ने कहा…

tha maine tumhe rulaya...

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