हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा! स्नेह का वह कण तरल था, बूँद कल की आज सागर,
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!
Tags:






5 टिप्पणियाँ:
gazab ,amazing.
mind blowing
ye jo poem hai mere life par ek dam sahi h .thank's all of u
vo baat nahi jo honi chaiye
tha maine tumhe rulaya...
एक टिप्पणी भेजें
आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !