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मैं आजकल बड़ी मुसीबत में हूं।

मुझे भाषण के लिए अक्सर बुलाया जाता है। विषय यही होते हैं- देश का भविष्य, छात्र समस्या, युवा-असंतोष, भारतीय संस्कृति भी(हालांकि निमंत्रण की चिट्ठी में ‘संस्कृति’ अक्सर गलत लिखा होता है), पर मैं जानता हूं जिस देश में हिंदी-हिंसा आंदोलन भी जोरदार होता है, वहां मैं ‘संस्कृति’ की सही शब्द रचना अगर देखूं तो बेवकूफ के साथ ही ‘राष्ट्र-द्रोही’ भी कहलाऊंगा। इसलिए जहां तक बनता है, मैं भाषण ही दे आता हूं।

मजे की बात यह है कि मुझे धार्मिक समारोहों में भी बुला लिया जाता है। सनातनी, वेदान्ती, बौद्ध, जैन सभी बुला लेते हैं; क्योंकि इन्हें न धर्म से मतलब है, न संत से, न उसके उपदेश से। ये धर्मोपदेश को भी समझना नहीं चाहते। पर ये साल में एक-दो बार सफल समारोह करना चाहते हैं। और जानते हैं कि मुझे बुलाकर भाषण करा देने से समारोह सफल होगा, जनता खुश होगी और उनका जलसा कामयाब हो जाएगा।

मैं उनसे कह देता हूं- जितना लाइट और लाउडस्पीकरवालों को दोगे, कम से कम उतना मुझ गरीब शास्ता को दे देना- तो वे दे भी देते हैं। मुझे अगर लगे कि इनका इरादा कुछ गड़बड़ है तो मैं शास्ता विक्रयकर अधिकारी या थानेदार की भी सहायता ले लेता हूं। ये लोग पता नहीं क्यूं मेरे प्रति आत्मीयता का अनुभव करते हैं। इनके कारण सारा काम ‘धार्मिक’ और ‘पवित्र’ वातावरण में हो जाता है।

पर मेरी एक नयी मुसीबत पैदा हो गयी है। जब मैं ऐसी बात करता हूं जिस पर शर्म आनी चाहिए, तब उस पर लोग हंसकर ताली पीटने लगते हैं।

मैं एक संत की जयंती के समारोह में अध्यक्ष था। मैं जानता था कि बुलाने वाले लोग मुझसे भीतर से बहुत नाराज रहते हैं। यह भी जानता हूं कि ये मुझे गंदी-गंदी गालियां देते हैं, क्योंकि राजनीति और समाज के मामले में मैं मुंहफट हो जाता हूं। तब सुनने वालों का दीन क्रोध बड़ा मजा देता है। पर उस शाम मेरे गले में वही लोग मालाएं डाल रहे थे- यह अच्छी और उदात्त बात भी हो सकती है। पर मैं जानता था कि ये मेरे व्यंग्य, हास्य और कटु उक्तियों का उपयोग करके उन तीन-चार हजार श्रोताओं को प्रसन्न करना चाहते हैं- याने आयोजन सफल करना चाहते हैं- याने बेवकूफ बनाना चाहते हैं।

जयन्ती एक क्रांतिकारी संत की थी। ऐसे संत की जिसने कहा- खुद सोचो। सत्य के अनेक कोंण होते हैं। हर बात में ‘शायद’ का ध्यान जरूर रखना चाहिए। महावीर और बुद्ध ऐसे संत हुए, जिन्होने कहा- सोचो। शंका करो। प्रश्न करो। तब सत्य को पहचानो। जरूरी नहीं कि वही शाश्वत सत्य है, जो कभी किसी ने लिख दिया था।

ये संत वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे। और जब तक इन संतों के विचारों का प्रभाव रहा तब तक विज्ञान की उन्नति भारत में हुई। भौतिक और रासायनिक विज्ञान की शोध हुई। चिकित्सा विज्ञान की शोध हुई। नागार्जुन हुए, बाणभट्ट हुए। इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी में भारत के बड़े से बड़े दिमाग ने यही काम किया कि सोचते रहे- ईश्वर एक हैं या दो हैं, या अनेक हैं। हैं तो सूक्ष्म हैं या स्थूल। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। इसके साथ ही केवल काव्य रचना।

विज्ञान नदारद। गल्ला कम तौलेंगे, मगर द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, मुक्ति और पुनर्जन्म के बारे में बड़े परेशान रहेंगे। कपड़ा कम नापेंगे, दाम ज्यादा लेंगे, पर पंच आभूषण के बारे में बड़े जाग्रत रहेंगे।

झूठे आध्यात्म ने इस देश को दुनिया में तारीफ दिलवायी, पर मनुष्य को मारा और हर डाला, उस धार्मिक संत-समारोह में मैं अध्यक्ष के आसन पर था। बायें तरफ दो दिगंबर मुनि बैठे थे। दाहिने तरफ दो श्वेतांबर। चार मुनियों से घिरा यह दीन लेखक बैठा था। पर सही बात यह है कि ‘होल टाइम’ मुनि या तपस्वी बड़ा दयनीय प्रणी होता है। वह सार्थकता का अनुभव नहीं करता, कर्म नहीं खोज पाता। श्रद्धा जरूर लेता है- मगर ज्यादा कर्महीन श्रद्धा ज्ञानी को बहुत ‘बोर’ करती है।

दिगंबर मुनि और श्वेतांबर मुनि आपस में कैसे देख रहे थे, यह मैं जांच रहा था। लेखक की दो नहीं सौ आंखें होती हैं। दिगंबर अपने को सर्वहारा का मुनि मानता है और श्वेतांबर मुनि को संपन्न समाज का। यह मैं समझ गया- उनके तेवर से।

मैंने आरंभ में कहा भी- “सभ्यता के विकास का क्रम होता है। जब हेण्डलूम, पावरलूम, कपड़ा मिल नहीं थी तब विश्व के हर समाज का ऋषि और शास्ता कम से कम कपड़े पहनता था; क्योंकि जो भी अच्छे कपड़े बन पाते थे, उन्हें सामंत वर्ग पहनता था। तब लंगोटी लगाना या नंगा रहना दुनिया भर में संत का आचार होता था।”

“पर अब हम फाइन से फाइन कपड़ा बनाते और बेचते हैं, पर अपने मुनियों को नंगा रखते हैं। यह भी क्या पाप नहीं है?”

मुनि मेरी बात सुनकर गंभीर हो गए और सोचने लगे, पर समारोह वाले हंसने और ताली पीटने लगे। और मैंने देखा एक मुनि उनके इस ओछे व्यवहार से खिन्न हैं। मैंने सोचा कि मुनि से कहूं कि हम दोनों मिलकर सिर पीट लें। शर्म की बात पर जिस समाज के लोगों को हंसी आये- इस बात पर मुनि और ‘साधु’ दोनों रो लें।

पर इसके बाद जब मुनि बोले तो उन्होंने घोर हिंसा की शैली में अहिंसा समझायी। कुछ शब्द मुझे अभी भी याद हैं, “पाखण्डियों, क्या संत को सर्टिफिकेट देने का समारोह करते हो? तुम्हारे सर्टिफिकेट से संत को कोई परमिट या नौकरी मिल जाएगी? पाप की कमाई खाते हो। झूठ बोलते हो। सत्य की बात करते हो। बेईमानी से परिग्रह करते हो। बताओ ये चार-पांच मंजिलों की इमारतें क्या सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह से बनी हैं?”

मैं दंग रह गया। मुनि का चेहरा लाल था क्रोध से। वे किसी सच्चे क्रांतिकारी की तरह बोल रहे थे; क्योंकि उन्होंने शरीर ढांकने को कपड़ा लेने का किसी से अहसान नहीं लेना था।

सभा में सन्नाटा।

लगातार सन्नाटा।

और मुनि पूसे क्रोध के साथ सारी बनावट और फरेब को नंगा कर रहे थे।

अंत में मुझे अध्यक्षीय भषण देना लाजिमी था। मैं देख रहा था कि तीस-चालीस साल के गुट में युवक लोग पांच-छ: ठिकानों पर बैठे इंतजार कर रहे थे कि मैं क्या कहता हूं।

मैंने बहुत छोटा धन्यवाद जैसा भाषण दिया। मुनियों और विद्वानों का आभार माना और अंत में कहा- “एक बात मैं आपके सामने स्वीकार करना चाहता हूं। मैंने और आपने तीन घंटे ऊंचे आदर्शों की, सदाचरण की, प्रेम की, दया की बातें सुनीं। पर मैं आपके सामने साफ कहता हूं कि तीन घंटे पहले जितना कमीना और बेईमान मैं था, उतना ही अब भी हूं। मेरी मैंने कह दी। आप लोगों की आप लोग जानें।”

इस पर भी क्या हुआ- हंसी खूब हुई और तालियां पिटीं।

उन्हें मजा आ गया।

एक और बड़े लोगों के क्लब में मैं भाषण दे रहा था। मैं देश की गिरती हालत, महंगाई, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार पर बोल रहा था और खूब बोल रहा था।

मैं पूरी पीड़ा से, गहरे आक्रोश से बोल रहा था। पर जब मैं ज्यादा मार्मिक हो जाता, वे लोग तालियां पीटते थे। मैंने कहा- हम लोग बहुत पतित हैं। तो वे ताली पीटने लगे।

उन्हे मजा आ रहा था और शाम एक अच्छे भाषण से सफल हो रही थी।

और मैं इन समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं, तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसें और ताली पीटें, उसमें क्या कभी कोई क्रांतिकारी हो सकता है?

होगा शायद। पर तभी होगा, जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबड़े टूटेंगे।

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