किसी का यूं तो हुआ कौन - फ़िराक़ गोरखपुरी


किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी

ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी


हजार बार ज़माना इधर से गुजरा

नई नई है मगर कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी


खुशा इशारा-ए-पैहम, जेह-ए-सुकूत नज़र

दराज़ होके फ़साना है मुख्तसर फिर भी


झपक रही हैं ज़मान-ओ-मकाँ की भी आँखें

मगर है काफ्ला आमादा-ए-सफर फिर भी


पलट रहे हैं गरीबुल वतन, पलटना था

वोः कूचा रूकश-ए-जन्नत हो, घर है घर, फिर भी


तेरी निगाह से बचने मैं उम्र गुजरी है

उतर गया रग-ए-जान मैं ये नश्तर फिर भी


2 टिप्पणियाँ:

शरद कोकास ने कहा…

आशुतोष आपकी सभी प्रस्तुतियाँ मैं देखता हूँ ।

लवली कुमारी ने कहा…

लगातार आपको पढ़ रही हूँ ..सार्थक कार्य कर रहे हैं आप

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