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मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई
निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया

बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए
मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया


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  1. वाह पहला शेर तो एकदम ही लाजवाब है. धन्यवाद.

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  2. मौत आई इश्क़ में तो हमें नींद आ गई
    निकली बदन से जान तो काँटा निकल गया

    बाज़ारे-मग़रिबी की हवा से ख़ुदा बचाए
    मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया

    बाज़ारे-मग़रिबी= सूरज डूबने के बाद का बाज़ार (हुस्न का बाज़ार)

    इनती सहजता से इतनी बड़ी बातें कह देना ही तो गज़ल की जान है
    और लिखने वाले का तो कोई जवाब नहीं
    वाह!

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