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सुबह की पहली किरण की तरह वो मेरे आँगन में छन्न से उतरी थी। उतरते ही टूटकर बिखर गई थी। और उसके बिखरते ही सारे आँगन में पीली-सी चमकदार रोशनी कोने-कोने तक फैल गई थी। खिलखिलाकर जब वो सिमटती तो रोशनी का एक घना बिंदु आँगन के बीचोबीच लरजने लगता और उसकी बेबाक हँसी से आँगन के जूही के फूल खुलकर अपनी खुशबू बिखेरने लगते। उसका नाम था प्रीत। मैं उसे प्रीतो कहती थी।

हुआ यों कि मेरी एक बड़ी पुरानी सहेली अपने घर जा रही थी। मेरे पति विदेश गए थे। घर वैसे भी काटने को दौड़ रहा था। सो जब मेरी सहेली ने ये प्रस्ताव रखा कि प्रीतो को कुछ दिन मैं घर में रख लूँ तो मैंने फौरन हाँ कर दी। मेरी सहेली का दायाँ हाथ थी प्रीतो, ये मैं जानती थी। उसके किंडर गार्डन स्कूल के बच्चे उसे तीतो कहकर स्कूल में घुसते और फिर वो उनकी प्रीत आँटी हो जाती।

प्रीतो को प्रीत कहलवाने का शौक था। स्कूल से लेकर तकिये के गिलाफ तक का काम प्रीतो के सुपुर्द था। पर जब छुटि्टयों में मैडम घर जाने लगी तो प्रीतो को साथ ले जाना उसकी बनिया बुद्धि को ठीक न लगा।

मेरी ये सहेली बचपन से ही दबंग थी।

एक बार गोलगप्पे वाले से उसका झगड़ा हुआ और मैडम की चप्पल की मार से वो भाग गया था। तब हम सब गोलगप्पों के खोमचे पर टूट पड़ने को ही थे कि मैडम खोमचे वाले की जगह बैठकर प्लेटें सजा-सजा कर सबको देने लगी।

आनन-फानन में गोलगप्पे हवा हो गए। तब उसने इमली के पानी की तुर्शी से सी-सी करते हुए बताया, 'मुआ मुझ अकेली को देखकर आँख मार रहा था। मैंने देसी जूती से वो पिटाई की कि भाग गया।' तब से हम उसे मैडम ही कहते थे। उसका असली नाम भूल ही गए। पर मैडम को कोई न भूला सका। उसके प्रस्ताव पर मैं थोड़ी नाखुश भी थी पर सोचा प्रीतो की रौनक रहेगी। दो दिन पहले ही मैडम प्रीतो को लेकर मेर घर आ गई थी। उसको कई किस्म के भाषण पिलाने के बाद जब मैडम ट्रेन पर बैठी तो प्रीतो जो उसका राई-रत्ती सँभालकर देती रही थी, थककर चूर हो चुकी थी।
आते ही जब दो सैरीडौन खाकर वो सो गई तो मैंने भी उससे कुछ पूछना ठीक न समझा। दूसरे दिन अभी सुबह न हुई थी पर घर में चहलकदमी की अपरिचित आवाज़ें आनी शुरू हो गई थीं। उन्हें तो मैं किसी तरह से सहती ही पर जब बाथरूम का पानी धुआँधार बहने की आवाज़ आई तो हिम्मत ने जवाब दे दिया। लोहे की बाल्टी में पूरे खुले नल के गिरते पानी से अधिक शोर शायद कोई नहीं कर सकता। बिस्तर में आँखें मीचे-मीचे मैं ज़ोर से चिल्लाई -
'प्री तो '
'जी मैडम,' वो जैसे सर पर ही खड़ी थी। 'खबरदार जो तुमने मुझे मैडम कहा,' मैं झल्लाकर उस पर बरस पड़ी तो वो मासूमियत से बोली, 'तो फिर क्या कहूँ मैडम जी।'
'पहले ये नल बन्द करो। और तुम मुझे दीदी कह सकती हो।'

वो मुझसे कब आकर लिपट गई मैं ये जान ही न पाई। दीदी, दीदी कहकर उसने सारा घर गुँजा दिया। और अपनी इस उदारता से मैं घमण्ड से फूल उठी। फिर उसके अतीत की चंद पोटलियाँ पलभर में ही मेरे सामने बिखरी पड़ी थीं।
प्रीतो अकेली बेटी थी। तीन-चार भाइयों की अकेली बहन। पर उसका बाप जो बढ़ई से ज़्यादा शराबी था, उसने इसके ज़रा-सा बड़ा होते ही इसे नम्बरदार के बेटे को ब्याह दिया। उसे पुराना दमा था। इस अन्याय का विरोध कौन करता। उसके भाई शराबी बाप की मार खा-खाकर दौड़ने की उम्र आते ही घर से भाग गए थे। माँ घर की दीवारों जैसी ही एक दीवार थी।

भगवान की करनी। सुहागरात के दिन ही सप्तपदी में अग्नि का धुआँ पी-पी कर दूल्हे महाशय को दमे का ऐसा दौरा पड़ा कि उसे हस्पताल ले जाना पड़ा। सुहाग शैया पर बैठी-बैठी प्रीतो सोयी रही। किसी ने उधर झाँका भी नहीं। सुबह लोगों ने कहा, ''कुलच्छनी ने आते ही पति पर वार कर दिया। पता नहीं नम्बरदार के इस नाम का क्या होगा। इसका पाँव तो जानलेवा है।'' तभी हमारी मैडम वहाँ पहुँच गई और शौहर के मरने से पहले ही उसे घर ले आई। सारे गाँव के मुकाबले में वो अकेली ही थी। पर दबंग ऐसी कि उसे देखते ही नम्बरदार हुक्का छोड़ उठ खड़ा हो। इसी दबंगता की वजह से आज तक उसकी शादी न हो पाई थी। ऐसी ख्याति थी कि पुरोहित भी उसकी जन्मपत्री लेकर कहीं जाने को राजी न होता। सो कुँआरी ही रह गई। प्रीतो की आँखों में तैरते सपने मैडम ने बड़ी आसानी से पोंछ डाले और शहर में आकर बच्चों का किंडर गार्डन खोल लिया। प्रीतो को जो सहारा मिला तो उसने अपना सारा मन बच्चों में ही लगा लिया। मैडम उसे प्यार भी करती है पर मजाल है जो कभी पता चलने दे।

प्रीतो, जिसने शादी से सुहाग सनी भाँवरों में शरमा-शरमाकर पाँव रखे, अग्नि के आगे कस्मे-वादे करते समय पिघलाती रही, वो प्रीतो कब तक अनुशासन में रहेगी इसका भय मुझे बराबर लग रहा था। मेरे घर में आते ही ज़रा-सी सहानुभूति उसकी आँखों में फिर से सपनों के सन्देशे बुनने लगी। सारा काम हँसते-हँसते निपटा लेती। और सारा दिन कोई छ: बार कंघी करके महाउबाऊ हेयर स्टाइल बनाती रहती। बिन्दी लगाने का उसे बड़ा ही चाव था। मैंने एक दिन कहा, 'प्रीतो, तू बिन्दी लगाकर मिटा क्यों देती है?'
उदास होकर बोली, 'वो जो मर गया है। पर दीदी, मेरा मन बिन्दी लगाने को करता है।' मैंने कहा, 'उससे तेरा क्या वास्ता है? ये कोई शादी थोड़े ही थी।'
वो उत्साहित होकर बोली, 'यही तो मैं कहती हूँ पर मैडम हमेशा टोक देती है। कहती हैं, लाल बिन्दी सिर्फ़ सुहागिनें लगा सकती है।'
'तुम काली बिन्दी लगाया करो।'
'हाँ दीदी, काली बिन्दी तो लगा ही सकती हूँ। और अब उसे मरे एक साल तो हो ही गया है। अब उसका प्रेत मुझे तंग नहीं कर सकता।' ये कहकर वो खिलखिलाकर हँस पड़ी। इतनी हँसी कि उसकी आँखें आँसुओं से भीग गईं।

नाक सुकड़कर वो अपने आँसुओं को पोंछते-पोंछते कहने लगी, 'दीदी, अगर वो ज़िन्दा रहता तो मैं गाँव कभी न छोड़ती। शादी से पहले एक बार उसने रास्ते में मेरा हाथ पकड़कर कहा था, 'कसम खा प्रीतो, मुझे कभी छोड़कर न जाओगी।'
मैंने अपने सबसे मीठे आम के दरख्त की कसम खाकर कहा था, 'कभी नहीं।'
तभी किसी के कदमों की आहट हुई थी और उसने मेरा हाथ छोड़ दिया था। उसके घर वाले कहते हैं, 'हमें पता था ये ज़्यादा दिन न रहेगा। हमने तो शादी इसलिए करवा दी थी कि प्रेत बनकर हमें तंग न करे।' मेरा गला उन्होंने काटना था सो काट दिया।'

मैंने कहा, 'प्रीतो, तू तो अभी २० की भी नहीं हुई, ऐसी बातें क्यों करती है? तेरी किसी भी बात से नहीं लगता तेरी शादी हो चुकी है। ये जोग तो तुमने मैडम की संगति में लिया है जानबूझकर। इसे छोड़ना ही होगा।'
'दीदी, पति को लेकर जो सपने मैं बुना करती थी उनका राजकुमार ये तो न था। वो सपने बड़ी बेरहमी के साथ मेरी आँखों में से पोंछ दिए गए। अब उस नई स्लेट पर कोई-न-कोई रोज़ आकर मिट जाता है। कोई मूरत बनती ही नहीं।'
मैंने उसे बड़े प्यार से पूछा, 'तुम्हें कोई अच्छा लगता है प्रीतो।'

'नहीं, पर जी चाहता है मैं किसी को अच्छी लगूँ। हाथ-पाँव में मेहंदी, माँग में सिंदूर, लाल जोड़ा और सुरमई आँखें। इनके साथ अगर सुहाग होता है तो मेरा भी हुआ था। पर सुहाग तो पति के साथ होता है। और वो तो मैंने देखा नहीं।'
'प्रीतो, मैडम का किंडर गार्डन तू ही तो सँभालती है। अगर तुझे कोई अच्छा लगे तो क्या सब छोड़ जाएगी?'
'पता नहीं दीदी।'
'पर मैडम क्या ये बात कभी सह पाएगी?'
'यही तो बात है, मैडम का मुझ पर पूरा भरोसा है। इसी से मुझे डर लगता है कि कहीं कोई अच्छा न लगे। मैडम तो मैडम, बच्चों के माँ-बाप भी मुझी पर भरोसा करते हैं। मैडम को तो सबके नाम भी नहीं आते। और फिर अगर एक दिन अपने हाथ से बनाकर न खिलाऊँ तो मैडम खाती ही नहीं। कभी-कभी मेरा मन नहीं करता तो भी बनाती हूँ। किसी को भूखा रखना पाप है न दीदी।'
मैंने उसकी तरफ़ देखा। जी चाहा इसे कहूँ, तू भी तो भूखी है प्रीतो। पर मैडम आकर मेरे दिमाग की इस नस को दबा गई और मैं मौन हो गई।

दो महीने कब निकल गए पता ही न चला। बस एक दिन मैडम आई और प्रीतो को लेकर चली गई। जाती बार प्रीतो ने चोरी से मुझसे कहा था, 'दीदी, मुझे भूल न जाना। मैं तो न आ पाऊँगी पर आप आना। मुझे बुलाओगी न दीदी।' मैंने उसके हाथ अपने हाथों में लिए और अपने आँसू किसी तरह उससे छुपाकर उसे हौसला दिया। फिर गृहस्थी के ताने-बाने को सुलझाती मैं प्रीतो की उलझनों को भूल-सी गई।

एक दिन भरी दोपहरी में मैं सोने जा रही थी तो मैडम आ धमकी। पहली ही साँस में उसने पूछा, 'यहाँ प्रीतो आई है?'
मैं जड़वत खड़ी रही, कुछ उत्तर न सूझा। जवान-जहान लड़की आखिर कहाँ गई। मुझे चुप देखकर मैडम बोली, 'उसे आग लगी है ये तो मैं जान गई थी। बस गलती एक ही हुई कि उसे मैं सब्ज़ी लेने अकेली भेजती रही। सब्ज़ी की टोकरी में छुपाकर बिन्दी ले जाती थी। उस मरघट के पास जाकर लगाती थी। क्या आग है बिन्दी लगाने की। जब भी कलमुँही आती देर लगाकर आती। फिर कपड़े इस्तरी करते वक्त, सब्ज़ी काटते वक्त या चपातियाँ सेंकते वक्त कैसे-कैसे तो शरमाकर मुस्कुराती थी पठ्ठी। मुझे क्या पता था इसे क्या मौत पड़ी है। नहीं तो उड़ने से पहले ही पर काटकर फेंक न देती। मुझे तो डर लग रहा था कहीं पागल न हो जाए। लक्षण सब वही थे। कुछ दिन पहले एक बच्चे की माँ ने न बताया होता तो मुझे कहाँ पता चलना था। कोई मुआ दर्ज़ी है। सब्ज़ी वाले की दुकान के पास, उसी के साथ भागी होगी राँड। उसी के साथ आँख मटक्का चल रहा था। एक बार मिले तो पुलिस में देकर छुट्टी पाऊँ। इन्स्पेक्टर तिवारी के दोनों बच्चे मेरे ही स्कूल में है।'

मैंने उसकी बातों का परनाला रोकते हुए कहा, 'मैडम, तुम रूखी-सूखी लकड़ी हो। अगर वो नागरबेल कहीं सहारा ढूँढ़ती है तो जाने दो उसे। उसे खुशी ढूँढ़ लेने दो।
बिफरकर मैड़म चिल्लाई, 'ओह, तो ये आग तुम्हारी लगाई हुई है। मुझे पहले ही समझ लेना चाहिए था कि मेरी ट्रेनिंग में कहाँ गलती हुई है। न तुम्हारे घर उसे रखती न ये नौबत आती।'
अब मुझे भी ताव आ गया। मैंने भी चिल्लाकर कहा, 'ये आग मैंने नहीं लगाई पर ये आग मुझे ही लगानी चाहिए थी। तुम मेरी दोस्त हो। तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त मैं न करूँगी तो कौन करेगा। तुम क्या जानो पुरुष के प्यार के बगैर ज़िन्दगी कैसी रेगिस्तान-सी होती है। फेरों की मारी को तुमने अपने अनुशासन के डण्डे से साधकर रखा है। तुम जल्लाद हो तोषी, तुम इन्सान नहीं हो। तुमने मुहब्बत की ज़िन्दगी नहीं देखी। कभी देखो तो जानोगी तुमने अब तक क्या खोया है।' मैडम झल्लाकर बोली -
'मुझे फरेब नहीं खाना है मिसेज आदित्य वर्मा। आप घर में रखकर देखिए, अगर तुम्हारे पालतू आदित्य को भी न झटका दे दे तो मेरा नाम भी तोषी नहीं। दिन-रात उसकी इशारेबाजियाँ क्या मेरी नज़रों से नहीं गुज़रतीं। अगर इस स्कूल की मुसीबत न होती तो कब की भेज देती उसी गाँव में जहाँ से कसाइयों के हाथ से इसे छुड़ाकर लाई थी।'
'शादी करवा दो उसकी।' मैंने कहा।
'हाँ, यही तो करना चाहिए था। और फिर तू भी तो करवा सकती है।'
मैंने कहा, 'वो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है तोषी, मैं तो खाली शादी में आ जाऊँगी। चलो चाये पियें। पानी खौल रहा होगा।'
तोषी बोली, 'तुम मेरा कलेजा और जलाना चाहती हो।' मैंने प्यार से उसका हाथ पकड़ा, 'चलो मैडम, तुम्हें रूह-अफज़ा पिलाती हूँ।' उसके बाद उसका जी थोड़ा हल्का हुआ तो मैंने कहा, 'मैडम, उसकी शादी कर दो। लड़की जवान और भावुकता की मारी है। उसके हालात में एक बार अपने-आपको खड़ा करो और सोचो।'
मैडम बोली, 'मैं कोई अच्छा लड़का देखकर कुछ कर पाती इसके पहले ही लगता है वो भाग गई है। आज दूसरा दिन है। तोबा-तोबा, अभी तो शाम की क्लासों के लिए बड़े बच्चे आते होंगे। लो मैं चली।'

मैडम को गए कई दिन हो गए। उससे प्रीतो के बारे में पूछने का हौसला मैं न जुटा पाई। फिर सब भूल-भुला गई। एक दिन शाम के वक्त मैंने दरवाज़ा खोला तो प्रीतो सामने खड़ी थी। पीछे एक लम्बा-तगड़ा खूबसूरत-सा लड़का।

शराब से वीर-बहूटी उसकी आँखें जैसे मेरे भीतर कुछ कंपा-सा गईं। बिखरे बाल और दम्भ से भरे चेहरे पर मस्तक उसने मेरी अभ्यर्थना में जरा-सा झुका भर दिया। प्रीतो ने कहा, 'यही दीदी है।' मैं स्नेह से दोनों को अंदर ले आई। कमरे में दोनों को बिठाकर थोड़ा-सा मुस्कुरायी भी। चाय का पानी चढ़ाने जैसे ही रसोईघर में गई, प्रीतो पीछे-पीछे आ गई।
हँसकर बोली, 'कैसा है?'
मैंने कहा, 'अच्छा।'
वो हँसी, फिर बोली, 'शराब तो रात को पीता है। आँखें हमेशा लाल रहती हैं।' होठों के कई बल सँवारकर वो हँसने लगी। हँसते-हँसते उसकी भरी आँखों को नज़रअंदाज़ करके मैंने कहा, 'मैडम को मिली?'
प्रीतो ने नीची नज़र करके कहा, 'गई थी। उसने निकाल दिया। और कहा दोबारा यहाँ मत आना। प्रकाश, यही आदमी बड़ा गुस्सा हुआ।' थोड़ा ठहरकर बोली, 'दीदी, मुझे पुरानी धोतियाँ देना। ये एक ही धोती है। मैडम की थी।'

मैंने उसे धोतियों के साथ शगुन के रुपए भी दिए और प्यार से कहा, 'प्रीतो, मैं हूँ, कभी उन्नीस-बीस हो तो याद रखना।' प्रीतो मेरे सीने से लगकर रो पड़ी। मुझे मालूम था वो गलती कर चुकी है। ये आदमी पति जैसा तो नहीं लग रहा। मैंने उसे भी जाते समय शगुन दिया। पता नहीं क्या हुआ उसने मेरे पाँव छुए। मुझे लगा बेटियाँ ऐसी ही विदा होती हैं।

फिर कुछ दिन बाद मैडम का फोन आया। बगैर भूमिका बाँधे उसने कहा, 'क्या दोस्ती निबाह रही हो मिसेज आदित्य वर्मा। कल तुम्हारी वही साड़ी पहने प्रीतो मिली थी जो हमने साथ-साथ कॉलेज के मेले से खरीदी थी। कमाल किया तुमने, साड़ी दी तो धुँआ तक न निकाला कि वो आई थी। देखना कहीं साड़ी से कभी आदित्य को भुलावा न हो।' ये कहकर उसने ठक्क से फोन बंद कर दिया।
आदित्य, मैं चौंकी। ये मैडम कितनी संगदिल है। उसके दूसरे ही दिन प्रीतो फिर आई, पर अकेली। आते ही मेरे पीछे-पीछे रसोईघर में आकर बोली, 'मुझे बैंगन की पकौडियाँ बना दोगी?' मैंने उसे भरपूर नज़र से देखा। वो शरमाई और कहने लगी, 'अभी तो तीन-चार महीने हैं। आज वो नासिक गया है तभी आ सकी हूँ। मुझे कुछ पैसे भी दोगी न। वो तो खाली राशन लाकर रख देता है। एक भी पैसा हाथ में नहीं देता। बाहर से ताला लगाकर दुकान पर जाता है। कभी भूने चने खाने को मन करता है। पैसे रात को उसकी पैंट से गिर जाते हैं तो ले लेती हूँ।' फिर अचानक खुश होकर बोली, 'वहाँ एक खिड़की है जिसमें से कूदकर मैं कभी-कभी निकल जाती हूँ। पर एक दिन पड़ोसिन ने उसे बता दिया था। उस रात उसने मुझे बहुत मारा।'
मैंने उसकी ओर देखे बिना पूछा, 'कोई शादी का काग़ज़ है तुम्हारे पास?'
बोली, 'नहीं, शादी तो मंदिर में हुई थी।'

पैसे लेकर प्रीतो चली गई। तीन-चार बरस उसका कोई पता न चला। एक दिन मैडम ही कहीं से ख़बर लाई थी कि उसका पति उसे बहुत मारता है। एक दिन देवर ने छुड़ाने की कोशिश की थी सो उसे भी मारा और प्रीतो को घर से निकाल दिया। वो तो पड़ोसियों ने बीच-बचाव करके फिर मेल करा दिया। मैं थोड़ी दु:खी हुई, फिर सोचा बच्चे हैं, बच्चों के सहारे औरतें रावण के साथ भी रह लेती हैं। कल बड़े हो जाएँगे। उनके साथ प्रीतो भी बड़ी हो जाएगी।

वक्त बढ़ता रहा। रोज़ सुबह भी होती, शाम भी। बच्चे स्कूल जाते, घर आते। आदित्य भी और मैं भी ज़िन्दगी के ऐसे अभिन्न अंग बन चुके थे कि उसी रोज़ के ढर्रे में ज़रा भी व्यवधान आता तो बुरा लगता। अपनी छोटी-सी दुनिया में पूरी दुनिया दिखाई देती। न वहाँ कहीं प्रीतो होती न उसका वह मरघट पति।

इसी तरह एक शाम आई। साथ लाई कुछ मेहमान। आदित्य बाज़ार से कुछ सामान लाने गए थे। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़ा खोला तो एक अजनबी औरत अपने फूल-से दो बच्चों को थामे खड़ी थी। मैंने सोचा किसी का पता पूछना चाहती है। मैंने उसे सवालिया निगाहों से देखा। वो मुस्कुराई। होंठ मुरझाए से थे तो भी मुस्कुराहट पहचान लेने में मुझे ज़्यादा देर न लगी। मैंने कहा, 'प्रीतो' - वो बच्चों की उँगलियाँ छुड़ाकर यों लिपटी जैसे इस भरी दुनिया में उसे पहिचानने वाली सिर्फ़ मैं अकेली थी।

मैंने उसे छुड़ाते हुए कहा, 'प्रीतो, घर में मेहमान हैं। आओ, अंदर चलो।'
उसे बिठाकर मैंने बच्चों को दूध और बिस्कुट दिए। उन्हें खाता छोड़कर प्रीतो मेरे पीछे-पीछे आ गई। बगैर भूमिका बाँधे उसने कहा --
'दीदी, वो चला गया है। दुबई। घर भी किसी और को दे गया। सिर्फ़ आज रात मुझे रह लेने दो।'
मैंने कहा, 'प्रीतो, ये मेहमान आज भी आए हैं। तुम्हें कहाँ सुलाऊँगी। फिर बच्चे भी हैं।'
प्रीतो ने कहा, 'इन्हें लेकर मैं बरामदे में सो जाऊँगी। कल सवेरे यहीं मैंने किसी को मिलना है। वो मेरा कोई इन्तज़ाम करने वाले हैं। मैडम मुझे किसी आश्रम में भेजना चाहती है। बस कुछ दिन की बात है।'
मेरा माथा ठनका। मैंने कहा, 'तुम मैडम के घर क्यों नहीं गईं?'
'वो कभी भी नहीं रखेगी दीदी। और फिर मैं आश्रम नहीं जाना चाहती।'
'पर क्यों?'
'अगर कभी इनका बाप आया तो?' मैंने कहा, 'अगर उसने आना होता तो जाता ही क्यों?'
उसने कहा, 'बस कुछ दिन इंतज़ार करूँगी। कुछ दिन की बात है।'

मेरी आँखों के आगे आदित्य का चेहरा घूम गया। मैडम की कही हुई बात भी याद आई। जो उन्होंने कहा था वो भी मुझे याद था। एक रात उनकी मर्ज़ी के बगैर भी रख सकती थी पर प्रीतो को ये पूछने का साहस उसमें न था कि कल कहाँ जाओगी? ये मैं जानती थी सिवाय मैडम के उसे कोई आश्रम जाने को राजी न कर सकेगा। यही एक लम्हा था, अगर मैं कमज़ोर पड़ जाती तो उसके जाने का कल ना जाने कब आता। मैंने अपने अंदर के इन्सान का गला दबाया और कहा, 'नहीं प्रीतो, यहाँ रहना मुमकिन नहीं हैं। ये लोग हमारे जेठ की लड़की देखने आए हैं। लड़की कल दिल्ली से आएगी। ऐसे नाजुक रिश्तों के दौरान मैं घर में कोई अनहोनी नहीं कर सकूँगी। तुम पैसे लो। अगर कल सवेरे यहाँ किसी को मिलना है तो टैक्सी में आ जाना। अब तुम जाओ।' मैंने उसके दोनों बच्चों को ऊँगली से लगाया। दरवाज़े के बाहर जाकर चौकीदार से टैक्सी मँगवाई और बच्चों के साथ प्रीतो को बैठते देखा। उसकी पसीने से तर हथेली में कुछ नोट खोंस दिए। टैक्सी को जाने का इंतज़ार किए बगैर घर आकर दरवाज़ा बन्द कर लिया।

ये दरवाज़ा मैंने प्रीतो के लिए बंद किया था या अपने लिए ये न जान पाई। रात-भर मुझे चौराहों के ख्वाब आते रहे। फिर कई दिन मैं दीवारों से पूछती रही, 'कल कहाँ जाओगी?'

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