टूटा पहिया - धर्मवीर भारती


मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत !


क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !


अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े-बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज़ को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ


लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !


2 टिप्पणियाँ:

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' ने कहा…

डॉ. साहब का तो मैं शुरू से ही प्रशंसक रहा हूँ. कनुप्रिया और अँधायुग की तो बात ही निराली है

बेनामी ने कहा…

wah wah...keep going

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