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रात ऊँघ रही है...
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।

चोरों के निशान —
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।

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  1. गुड्डोदादी चिकागो सेजुलाई 22, 2010 5:02 pm

    अमृता जी
    आज भी नज्म जी कर लिखने वाले बहुत हैं पर नज्म को समझने वाले बहुत ही कम
    अश्रु धरा निकली इतना दर्द सीने में कैसे रक्खा

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