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मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ
मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ

फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी
साथ मेरे मेरे फ़िर्दौस-ए-जवाँ तक आओ

तेग़ की तरह चलो छोड़ के आग़ोश-ए-नियाम
तीर की तरह से आग़ोश-ए-कमाँ तक आओ

फूल के गिर्द फिरो बाग़ में मानिन्द-ए-नसीम
मिस्ल-ए-परवाना किसी शम-ए-तपाँ तक आओ

लो वो सदियों के जहन्नुम की हदें ख़त्म हुई
अब है फ़िर्दौस ही फ़िर्दौस जहाँ तक आओ

छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यकीं तक पहुँचो
पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ

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  1. सरदार जाफ़री जी ने अच्छा लिखा पर कुछ शब्द समझ नही आये.

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