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द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया का परिणाम छायावाद है। द्विवेदी युग में राष्ट्रीयता के प्रबल स्वर में प्रेम और सौन्दर्य की कोमल भावनाएँ दब सी गयी थी। इन सरस कोमल मनोवृतियों को व्यक्त करने के लिए कवि - ह्रदय विद्रोह कर उठा । ह्रदय की अनुभूतियों तथा दार्शनिक विचारों की मार्मिक अभिव्यक्ति के परिणामस्वरूप ही छायावाद का जन्म हुआ। छायावाद काव्यधारा ने हिंदी को शुष्क प्रचार से बचाया । हिंदी की खड़ी बोली कविता को सौन्दर्य और सरसता प्रदान की। छायावाद ने हिंदी की प्रसाद ,पन्त और निराला जैसे महाकवि दिए । पल्लव ,कामायनी और राम की शक्तिपूजा छायावाद की महान उपलब्धि है।

यहां पर प्रसिद्ध आलोचक डॉ.रामविलास शर्मा द्वारा हिंदी के छायावादी कवियों पर आलोचनात्मक विचार विडियो के रूप में दिया जा रहा है। आशा है कि इसके माध्यम से छायावाद को समझने में सहायता मिलेगी -


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