1
Advertisement
इंशाजी क्यों आशिक हो कर,
दर्द के हाथों शोर करो,
दिल को और दिलासा दे लो,
मन को मियां कठोर करो।
आज हमें उस दिल की हकायत ,
दूर तलक ले जानी है,
शाख़ पे गुल है बाग़ में बुलबुल,
जी में मगर वीरानी है।
इश्क़ है रोग कहा था हम ने,
आप ने लेकिन माना भी,
इश्क़ में जी से जाते देखे, इंशा जैसे दानां भी,
हम जिस के लिए हर देस फिरे, जोगी का बदल कर भेस फिरे,
बस दिल का भरम रह जाएगा,
ये दर्द तो अच्छा कहाँ होगा.

एक टिप्पणी भेजें

  1. .....तबीअत कुछ उदास थी......हिंदी कुञ्ज को खोला तो काफी कुछ ऐसा मिला जो राहत प्रदान करने वाला साबित हुआ......आपकी मेहनत, लगन और जनून ...प्रशंसा के लिए पर्याप्त शब्द नहीं मिल रहे...बोधिकता का साथ छोड़े बिना आप दिल की बात भी कर रहे हैं और दिल के स्कून की भी....दूसरी रचनायों की तरह इब्ने इंशा की रचनायें भी अंतर आत्मा की तारों को झंकुर्त करने के साथ साथ बहुत सी खट्टी मीठी यादों को ताज़ा करती हैं....अब यह कमाल इंशा का है, बच्चन जी की मधुशाला का या फिर इस मैखाने के किसी और रस का....पर आपकी इस मेहनत और प्रस्तुती के बिना तो यह संभव न था....कुल मिलकर इस सुंदर साईट के लिए बहुत बहुत मुबारक हो....

    आपका अपना ही;
    -रैक्टर कथूरिया
    http://www.punjabscreen.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top