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तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार जब से है
न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है

किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म
गिला है जो भी किसी से तेरी सबब से है

हुआ है जब से दिल-ए-नासबूर बेक़ाबू
कलाम तुझसे नज़र को बड़ी अदब से है

अगर शरर है तो भड़के, जो फूल है तो खिले
तरह तरह की तलब तेरे रन्ग-ए-लब से है

कहाँ गये शब-ए-फ़ुरक़त के जागनेवाले
सितारा-ए-सहर हम-कलाम कब से है



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  1. भाई मैं तो पहली बार इस ब्लॉग पर आया ...मगर दोस्त यह तो पूरा खजाना है.......अब तो लगातार आते रहने की स्थिति बन गयी.

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  2. शुक्रिया .......... लाजवाब ग़ज़ल है .......... जनाब फ़ैज़ जी की शायरी क बस मज़ा ही ले सकते हैं ........

    उत्तर देंहटाएं

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