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ग़म न हो पास इसी से उदास मेरा मन ।

साँस चलती है, चिहुँक चेतता नहीं है तन ।।


नींद ऐसी न किसी और को आई होगी,

जाग कर ढूँढती धरती कहाँ है मेरा गगन ।


मौसमी गुल हो निछावर, बहार तुम पर ही,

क़ाबिले दीद ख़िजाँ में खिला है मेरा चमन ।


भूलकर कूल ग़र्क़ कश्तियाँ हुईं कितनी,

लौट मझधार से आया चिरायु ख़ुद मरण ।


बुलबुलों ने दिया दुहरा कलाम ग़ंचों का,

गंध बर मौन रहा आह! एक मेरा सुमन ।



आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री छायावाद के प्रमुख स्तम्भ में से एक हैवे हिंदी के साथ -साथ संस्कृत में भी कवितायेँ करते है। 'रूप-अरूप, 'तीर तरंग, 'शिवा, 'मेघ-गीत, 'अवंतिका, 'कानन, 'अर्पण आदि इनके मुख्य काव्य संग्रह हैं।

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