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डरो बाबा - नज़ीर अकबराबादी
डरो बाबा - नज़ीर अकबराबादी

बटमार अजल का आ पहुँचा, टक उसको देख डरो बाबा अब अश्क बहाओ आँखों से और आहें सर्द भरो बाबा दिल, हाथ उठा इस जीने से, ले बस मन मार, मरो बाबा जब ब...

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मक्खीचूस गीदड - पंचतंत्र की  कहानियां
मक्खीचूस गीदड - पंचतंत्र की कहानियां

जंगल मे एक गीदड रहता था था। वह बडा क कंजूस था,क्योंकि वह एक जंगली जीव था इसलिए हम रुपये-पैसों की कंजूसी की बात नझीं कर रहे। वह कंजूसी अपने श...

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निर्मला (४) - प्रेमचंद का उपन्यास
निर्मला (४) - प्रेमचंद का उपन्यास

कल्याणी के सामने अब एक विषम समस्या आ खड़ी हुई। पति के देहान्त के बाद उसे अपनी दुरवस्था का यह पहला और बहुत ही कड़वा अनुभव हुआ। दरिद्र विधवा क...

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रामदास - रघुवीर सहाय की कविता
रामदास - रघुवीर सहाय की कविता

चौड़ी सड़क गली पतली थी दिन का समय घनी बदली थी रामदास उस दिन उदास था अंत समय आ गया पास था उसे बता, यह दिया गया था, उसकी हत्या होगी। धीरे ध...

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कर चले हम फ़िदा - कैफ़ी आज़मी
कर चले हम फ़िदा - कैफ़ी आज़मी

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया कट गए सर हमारे तो ...

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ईश्वरीय न्याय - प्रेमचंद की कहानियाँ
ईश्वरीय न्याय - प्रेमचंद की कहानियाँ

कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामिभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों र...

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अनाथ लड़की - प्रेमचंद की कहानियाँ
अनाथ लड़की - प्रेमचंद की कहानियाँ

सेठ पुरुषोत्तमदास पूना की सरस्वती पाठशाला का मुआयना करने के बाद बाहर निकले तो एक लड़की ने दौड़कर उनका दामन पकड़ लिया। सेठ जी रुक गये और मुहब...

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दिन जल्दी-जल्दी ढलता है  - हरिवंशराय बच्चन की कविता
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है - हरिवंशराय बच्चन की कविता

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ! हो जाय न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी...

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अपाहिज व्यथा  - दुष्यन्त कुमार की कविता
अपाहिज व्यथा - दुष्यन्त कुमार की कविता

अपाहिज व्यथा को सहन कर रहा हूँ, तुम्हारी कहन थी, कहन कर रहा हूँ । ये दरवाज़ा खोलो तो खुलता नहीं है, इसे तोड़ने का ज...

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रानी केतकी की कहानी - सैयद इंशा अल्ला खां
रानी केतकी की कहानी - सैयद इंशा अल्ला खां

यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट। और न किसी बोली का मेल है न पुट॥ सिर झुकाकर नाक रगडता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसन...

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