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मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के।
आगे-आगे नाचती - गाती बयार चली
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगी गली-गली

पाहुन ज्यों आये हों गाँव में शहर के।
पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाये
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाये
बाँकी चितवन उठा नदी, ठिठकी, घूँघट सरके।

बूढ़े़ पीपल ने आगे बढ़ कर जुहार की
‘बरस बाद सुधि लीन्ही’
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।

क्षितिज अटारी गदरायी दामिनि दमकी
‘क्षमा करो गाँठ खुल गयी अब भरम की’
बाँध टूटा झर-झर मिलन अश्रु ढरके
मेघ आये बड़े बन-ठन के, सँवर के।

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  1. मेघ आये बन ठन के सँवर के…………और मैं भी भींग गया था पिछली बारिश की हलकी फुहार में ……

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  2. बहुत सुन्दर कविता है सक्सेना जी को बधाई

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  3. गज़ब का संकलन और प्रस्तुति कर रहे हैं आप...

    यहां आना अच्छा लगा...

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  4. सक्सेना जी,बहुत बढ़िया रचना है।बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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