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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

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  1. प्रेम की उन्मुक्त रचना ......... निराला जी की हर रचना निराली ही होती थी ........ शुक्रिया आपका ........

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  2. copy kyu nahi kar sakte highlight karkar, isilie bakwas website he

    उत्तर देंहटाएं

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